Wheat Stubble burning: हरियाणा में गेहूं की पराली जलाने के मामलों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार, 1 से 30 अप्रैल के बीच कुल 1,565 खेतों में आग लगाने की घटनाएं सामने आईं, जो पिछले साल इसी अवधि में दर्ज 608 मामलों की तुलना में 157 फीसदी ज्यादा है. हालांकि, यह संख्या 2022 के अप्रैल में दर्ज 2,033 मामलों से कम है, लेकिन यह पिछले दो सालों की तुलना में बढ़ोतरी को दिखाती है. इससे सरकार की चिंता बढ़ गई है. हालांकि, प्रशासन पराली जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है.
अप्रैल के ज्यादातर दिनों में आग लगने की घटनाएं सामान्य रहीं, लेकिन महीने के अंत में अचानक तेज बढ़ोतरी देखी गई. खासकर 24 अप्रैल के बाद. यह बढ़ोतरी इसलिए हुई, क्योंकि कई जिलों में गेहूं की कटाई अपने चरम पर पहुंच गई और खेत जल्दी साफ करने के लिए पराली जलाने के मामले बढ़ गए. अंतिम पांच दिनों में हालात काफी बिगड़ गए और घटनाओं की संख्या करीब 500 से बढ़कर 1,500 से ज्यादा हो गई. सबसे ज्यादा मामले जींद में 264 दर्ज किए गए. इसके बाद रोहतक में 241, झज्जर में 183, सोनीपत में 127, कैथल में 115, करनाल में 114, सिरसा में 98, पानीपत में 85 और हिसार में 81 मामले दर्ज किए गए. ये सभी जिले मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र वाले हैं. इसी तरह फरीदाबाद में 20 और पलवल में 38 मामले सामने आए हैं.
विशेषज्ञों ने दी गंभीर चेतावनी
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस गर्मी में आग की घटनाएं 2025 के धान सीजन के आंकड़ों से भी ज्यादा होना एक गंभीर संकेत है. एनवायरो कैटालिस्ट्स के संस्थापक और मुख्य विश्लेषक सुनील दहिया ने ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा कि धुएं की मात्रा मौसम के अनुसार नहीं बदलती, लेकिन वातावरण उसे कैसे संभालता है, यह अलग होता है. सर्दियों में हवा भारी और स्थिर रहती है, जिससे प्रदूषण सतह पर ही फंस जाता है. वहीं गर्मियों में हवा इसे ज्यादा फैलाती है, लेकिन यह दूर-दराज के शहरों तक भी पहुंचकर वहां की हवा को खराब कर देती है.
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उन्होंने कहा कि पराली जलाना अब सिर्फ सर्दियों की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह पूरे साल चलने वाला एक बढ़ता हुआ खतरा बन चुका है, जो वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं की पराली जलाने की घटनाएं धान के मौसम की तुलना में कम होती हैं, लेकिन फिर भी यह स्थानीय प्रदूषण, मिट्टी की उर्वरता में कमी और क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाती हैं.
अधिकारी रख रहे स्थिति पर नजर
अधिकारियों के अनुसार, जिला स्तर की टीमें स्थिति पर नजर रख रही हैं और किसानों के साथ मिलकर फसल अवशेष के इन-सीटू और एक्स-सीटू प्रबंधन को बढ़ावा दे रही हैं. राज्य कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि सरकार का मुख्य फोकस जागरूकता फैलाने, मशीनरी उपलब्ध कराने और समय पर हस्तक्षेप करने पर है, ताकि पराली जलाने की प्रवृत्ति को रोका जा सके. उन्होंने यह भी कहा कि गेहूं की पराली जलाने की घटनाओं की जिला स्तर पर समीक्षा की जा रही है और धान के सीजन से पहले सुधारात्मक कदम और मजबूत किए जाएंगे.
धान की तरह गेहूं की पराली पर भी मिले बोनस
एमएसपी कमेटी के सदस्य और भारतीय किसान यूनियन (मान) के पूर्व हरियाणा अध्यक्ष गुणी प्रकाश ने ‘किसान इंडिया’ से बातचीत में कहा कि किसानों में प्रदूषण को लेकर काफी जागरूकता बढ़ी है और अब बहुत कम किसान पराली जला रहे हैं. हालांकि उन्होंने कहा कि पराली जलाने के मामलों में और कमी आनी चाहिए. इसके लिए सरकार को सुझाव दिया गया है कि जिस तरह धान की पराली पर बोनस दिया जाता है, उसी तरह गेहूं की पराली पर भी किसानों को प्रोत्साहन राशि दी जाए.