Haryana Wheat Procurement: भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) ने हरियाणा में गेहूं उठान में देरी होने का आरोप लगाया है. यूनियन ने कहा है कि मंडियों से खरीदे गए गेहूं का उठान धीमा होने की वजह से किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिल रहा है. यूनियन के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने फूड, सिविल सप्लाई और कंज्यूमर अफेयर्स विभाग के डायरेक्टर को पत्र लिखकर इस देरी पर नाराजगी जताई और सरकार से नीतियों में जरूरी बदलाव करने की मांग की है.
बीकेयू (चढूनी) के प्रवक्ता राकेश कुमार बैंस ने ‘द ट्रिब्यून’ से कहा कि राज्य की अनाज मंडियों में किसानों को उनकी फसल का भुगतान समय पर नहीं मिल रहा है, जो सरकार की घोषित नीति के बिल्कुल विपरीत है. सरकार ने कहा था कि फसल बेचने के 48 से 72 घंटे के भीतर पैसे किसानों के खाते में आ जाएंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल नजर आ रही है.
15 से 20 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा
उन्होंने आगे कहा कि किसानों को भुगतान तब तक जारी नहीं होता, जब तक उनकी फसल का उठान नहीं हो जाता और गेट पास जारी नहीं किया जाता. इस व्यवस्था की वजह से अगर उठान में देरी होती है- चाहे वह आढ़तियों, अधिकारियों या ट्रांसपोर्टरों की लापरवाही से हो तो उसका खामियाजा किसानों को ही भुगतना पड़ता है. बैंस ने कहा कि कई मामलों में किसानों को अपनी फसल का पैसा पाने के लिए 15 से 20 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है. यह न सिर्फ गलत है, बल्कि किसानों के साथ गंभीर भेदभाव भी है. उन्होंने कहा कि फसल के उठान में देरी के लिए किसान जिम्मेदार नहीं होते, फिर भी भुगतान में देरी का नुकसान उन्हें ही झेलना पड़ता है.
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48 से 72 घंटे के भीतर भुगतान हो
यूनियन ने सरकार से मांग की है कि उसकी खरीद नीति में तुरंत बदलाव किया जाए. उनका कहना है कि जैसे ही किसान की फसल बिक जाती है और ‘J-फॉर्म’ जारी हो जाता है, वैसे ही तय 48 से 72 घंटे के भीतर भुगतान सीधे किसान के बैंक खाते में आ जाना चाहिए. इसके लिए यह शर्त नहीं होनी चाहिए कि फसल का उठान हुआ है या नहीं.
जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी
बैंस ने आगे कहा कि सरकार को किसानों की परेशानी समझनी चाहिए. किसान पहले सरकार के सभी नियम और औपचारिकताएं पूरी करके अपनी फसल बेचने के लिए इंतजार करते हैं, और फिर उन्हें भुगतान के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए सरकार से अनुरोध किया गया है. अगर जल्द ही इसका हल नहीं निकाला गया, तो यूनियन आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी और इसके परिणामों की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी.