जूट सेक्टर को पुनर्जीवित करने के लिए CACP का मास्टर प्लान, MSP से लेकर निर्यात तक बदलाव की सिफारिश

अब कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने जूट सेक्टर को फिर से मजबूत बनाने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं. CACP का मानना है कि अगर जूट की खेती को बचाना है तो सबसे पहले किसानों का भरोसा लौटाना होगा. इसके लिए खेती का क्षेत्र बढ़ाने, बेहतर दाम देने और बाजार को स्थिर बनाने की जरूरत है.

नई दिल्ली | Published: 26 Feb, 2026 | 07:40 AM

CACP jute recommendations: भारत में जूट को कभी “स्वर्ण रेशा” कहा जाता था. गांवों में इसकी खेती से हजारों परिवारों का गुजारा चलता था और शहरों की फैक्ट्रियों में इससे बोरे, रस्सियां और कई तरह के सामान बनते थे. लेकिन समय के साथ जूट की खेती कम होती चली गई. किसान दूसरी फसलों की ओर मुड़ गए और उत्पादन भी घटता गया. अब कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने जूट सेक्टर को फिर से मजबूत बनाने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं. इन सिफारिशों से उम्मीद जगी है कि जूट एक बार फिर किसानों की आय बढ़ाने का सहारा बन सकता है.

क्यों कम हुई जूट की खेती?

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो-तीन दशकों में जूट की खेती का रकबा लगातार घटा है. कई किसानों को लगा कि दूसरी फसलें ज्यादा फायदा दे रही हैं. कहीं बाजार की अनिश्चितता रही, तो कहीं लागत ज्यादा और दाम कम मिलने की शिकायत रही. ऐसे में जूट धीरे-धीरे किसानों की प्राथमिकता से बाहर होने लगा.

CACP का मानना है कि अगर जूट की खेती को बचाना है तो सबसे पहले किसानों का भरोसा लौटाना होगा. इसके लिए खेती का क्षेत्र बढ़ाने, बेहतर दाम देने और बाजार को स्थिर बनाने की जरूरत है.

अच्छे बीज, बेहतर उत्पादन

जूट की नई और उन्नत किस्में वैज्ञानिकों ने तैयार की हैं, लेकिन अभी भी कई किसान पुरानी किस्मों के बीज बो रहे हैं. इससे उत्पादन भी कम होता है और रेशे की गुणवत्ता भी उतनी अच्छी नहीं मिलती. सरकार की कुछ योजनाओं के तहत अच्छे बीज दिए जाते हैं, लेकिन उनकी पहुंच सीमित है.

आयोग ने सुझाव दिया है कि नए और उच्च गुणवत्ता वाले बीज बड़े पैमाने पर तैयार किए जाएं और समय पर किसानों तक पहुंचें. जब बीज अच्छा होगा तो फसल भी अच्छी होगी. इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी और बाजार में भारतीय जूट की मांग भी मजबूत होगी.

सही आंकड़े, सही फैसले

एक बड़ी समस्या यह भी सामने आई है कि जूट उत्पादन के आंकड़ों में अलग-अलग संस्थाओं के बीच अंतर है. जब आंकड़े ही स्पष्ट नहीं होंगे तो सही नीति बनाना मुश्किल हो जाता है. इसलिए आयोग ने सुझाव दिया है कि इस अंतर को दूर करने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई जाए. साफ और भरोसेमंद आंकड़े होंगे तो किसानों और उद्योग दोनों को फायदा मिलेगा.

अच्छी गुणवत्ता को मिले ज्यादा दाम

देश में जो जूट पैदा होता है, उसका बड़ा हिस्सा कम गुणवत्ता वाला होता है. बेहतर ग्रेड के जूट की हिस्सेदारी कम है. वजह यह है कि अच्छी गुणवत्ता पैदा करने पर किसानों को उतना अतिरिक्त फायदा नहीं मिलता.

CACP का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बेहतर ग्रेड के जूट को ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाए. यानी जो किसान अच्छी गुणवत्ता का रेशा उगाएं, उन्हें ज्यादा दाम मिले. इससे किसान भी गुणवत्ता सुधारने की कोशिश करेंगे और देश का जूट उद्योग भी मजबूत होगा.

मशीनीकरण से घटेगी मेहनत और खर्च

जूट की खेती में मजदूरी पर काफी खर्च आता है. बुवाई से लेकर निराई और कटाई तक मेहनत ज्यादा लगती है. आयोग ने सुझाव दिया है कि खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. जैसे लाइन में बुवाई के लिए सीड ड्रिल और निराई के लिए आधुनिक औजारों का उपयोग.

अगर मशीनों का उपयोग बढ़ेगा तो समय और पैसा दोनों की बचत होगी. युवा किसान भी आधुनिक तरीके अपनाने में ज्यादा रुचि दिखाएंगे. सरकार अगर इन उपकरणों पर सब्सिडी और प्रशिक्षण दे तो बड़ा बदलाव आ सकता है.

खरीद व्यवस्था मजबूत हो

कई बार किसान शिकायत करते हैं कि उनकी फसल सही समय पर और सही दाम पर नहीं खरीदी जाती. जूट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (JCI) की पहुंच हर इलाके तक नहीं है. दूरदराज के किसानों को मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.

आयोग ने कहा है कि राज्यों, सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों को साथ लेकर खरीद प्रणाली को मजबूत किया जाए. अगर किसान को भरोसा होगा कि उसकी फसल सही दाम पर बिकेगी, तो वह जूट की खेती छोड़ने के बारे में नहीं सोचेगा.

निर्यात के नए रास्ते तलाशने की जरूरत

भारत जूट उत्पादों का बड़ा निर्यातक है, लेकिन हमारा निर्यात कुछ ही देशों पर ज्यादा निर्भर है. इससे जोखिम बढ़ जाता है. अगर किसी एक देश में मांग कम हुई या टैरिफ बढ़ा तो असर सीधा उद्योग पर पड़ता है.

CACP ने सुझाव दिया है कि जूट उत्पादों की विविधता बढ़ाई जाए और नए बाजार खोजे जाएं. आज दुनिया में पर्यावरण के अनुकूल और प्लास्टिक के विकल्प की मांग बढ़ रही है. जूट इस जरूरत को पूरा कर सकता है. सही ब्रांडिंग और गुणवत्ता सुधार से भारत इस मौके का फायदा उठा सकता है.

सस्ते आयात पर नजर जरूरी

कुछ पड़ोसी देशों से जूट और जूट उत्पादों का आयात होता है, जहां सरकारें निर्यात को प्रोत्साहन देती हैं. इससे भारतीय किसानों और उद्योग को नुकसान हो सकता है. आयोग ने कहा है कि ऐसे आयात की निगरानी जरूरी है और जरूरत पड़ने पर कदम उठाने चाहिए.

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