मचान विधि से तोरई की खेती करेगी कमाल, एक महीने में तुड़ाई शुरू और किसानों को मिलेगा शानदार मुनाफा

Trellis Method: तोरई की मचान विधि किसानों के लिए कम समय में अच्छी कमाई का शानदार मौका बन रही है. यह तकनीक जल्दी उत्पादन देती है, फसल की गुणवत्ता बेहतर रखती है और शुरुआती बाजार में अच्छे दाम दिलाती है. सही मौसम, सिंचाई और देखभाल से किसान कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.

नोएडा | Updated On: 10 Apr, 2026 | 01:29 PM

Ridge Gourd Farming: सब्जियों की खेती में अगर किसान कम समय में अच्छा मुनाफा चाहते हैं, तो तोरई की मचान विधि उनके लिए बेहतरीन विकल्प बन सकती है. पारंपरिक खेती की तुलना में यह तरीका जल्दी उत्पादन देता है और बाजार में शुरुआत में बेहतर भाव मिलने से कमाई भी मजबूत होती है. NHRDF के संयुक्त निदेशक डॉ. रजनीश मिश्रा के अनुसार, गर्मी के मौसम में अगैती तोरई की खेती किसानों के लिए नकदी फसल का शानदार विकल्प है. सही मौसम, संतुलित सिंचाई और मचान तकनीक अपनाकर किसान करीब एक महीने में तुड़ाई शुरू कर सकते हैं और अच्छी आय हासिल कर सकते हैं.

मचान विधि क्यों है तोरई के लिए सबसे फायदेमंद?

डॉ. रजनीश मिश्रा के अनुसार, मचान विधि  में तोरई की बेलों को जमीन पर फैलाने के बजाय ऊपर जाल या बांस के सहारे चढ़ाया जाता है. इससे बेलों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे पौधों की बढ़वार तेज होती है. इस तरीके से फल सीधे और साफ निकलते हैं. जमीन से ऊपर रहने के कारण सड़न, कीट और फफूंद का खतरा भी कम हो जाता है. साथ ही तुड़ाई करना आसान हो जाता है, जिससे मजदूरी लागत घटती है. यही वजह है कि आज कई किसान पारंपरिक तरीके छोड़कर मचान विधि अपना रहे हैं.

एक महीने में शुरू होगी फसल, जल्दी मिलेगा बाजार भाव

इस खेती की सबसे बड़ी खासियत इसकी जल्दी तैयार होने वाली फसल  है. रोपाई के लगभग 30 दिन बाद ही तोरई निकलनी शुरू हो जाती है. शुरुआती फसल बाजार में कम उपलब्ध होने की वजह से इसके दाम काफी अच्छे मिलते हैं. डॉ. मिश्रा बताते हैं कि सीजन की शुरुआत में किसान को 60 से 80 रुपये प्रति किलो तक कीमत मिल सकती है. जल्दी तैयार फसल होने से किसान कम समय में लागत निकाल लेते हैं और उसके बाद लगातार मुनाफा कमाते हैं. अगर किसान चरणबद्ध तरीके से बुवाई करें, तो लंबे समय तक बाजार में तोरई की सप्लाई देकर लगातार कमाई कर सकते हैं. यही कारण है कि इसे तेजी से बढ़ती नकदी सब्जी फसल माना जा रहा है.

अच्छी पैदावार के लिए मौसम और मिट्टी का रखें ध्यान

डॉ. मिश्रा के अनुसार तोरई की खेती  के लिए गर्म और हल्की नमी वाला मौसम सबसे अच्छा रहता है. 25 से 37 डिग्री सेल्सियस तापमान इसकी बढ़वार के लिए उपयुक्त माना जाता है. मिट्टी की बात करें तो 6.5 से 7.5 पीएच वाली दोमट मिट्टी सबसे बेहतर रहती है. खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था जरूरी है, क्योंकि ज्यादा पानी रुकने से जड़ें खराब हो सकती हैं. खेती के लिए 2.5×2 मीटर दूरी पर करीब 30 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे तैयार करने चाहिए. इनमें अच्छी सड़ी गोबर की खाद और जरूरी पोषक तत्व मिलाकर पौध लगाना चाहिए. इससे पौध तेजी से बढ़ती है और फलन बेहतर होता है.

सिंचाई, गुड़ाई और देखभाल से बढ़ेगी कमाई

तोरई की खेती में समय पर सिंचाई और गुड़ाई  बेहद जरूरी है. डॉ. मिश्रा के अनुसार रोपाई के बाद शुरुआती दिनों में हल्की सिंचाई करें और मिट्टी को भुरभुरी बनाए रखें. बेल बढ़ने के साथ मचान पर सही दिशा में चढ़ाना चाहिए, ताकि हर पौधे को धूप मिल सके. खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर गुड़ाई करें. साथ ही जैविक कीट प्रबंधन और फेरोमेन ट्रैप जैसे आसान उपाय अपनाकर फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है. वे किसानों को सलाह देते हैं कि बाजार की मांग के अनुसार अगैती खेती करें, क्योंकि शुरुआत में दाम ज्यादा मिलते हैं. सही तकनीक और देखभाल से किसान एक छोटे क्षेत्र से भी अच्छी कमाई कर सकते हैं.

Published: 10 Apr, 2026 | 01:29 PM

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