महंगी खाद बनेगी किसानों की नई मुसीबत, घट सकती है पैदावार.. भारत समेत कई देशों पर असर
दुनियाभर में उर्वरकों की बढ़ती कीमतों से कृषि उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि महंगी खाद के कारण किसान कम उर्वरक इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे पैदावार घट सकती है. हालांकि भारत सरकार खरीफ सीजन में खाद की उपलब्धता को लेकर आश्वस्त है, लेकिन वैश्विक बाजार में जोखिम अभी भी बना हुआ है.
Fertilizer Price Hike: दुनियाभर में उर्वरकों की बढ़ती कीमतों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद महंगी बनी रही तो किसान इसका कम इस्तेमाल करेंगे. इससे फसलों की पैदावार घट सकती है और भविष्य में कृषि उत्पादन प्रभावित होने के साथ कृषि जिंसों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है. डच वित्तीय सेवा कंपनी ING Think के विश्लेषकों के अनुसार, खाद की ऊंची कीमतों से सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों के किसानों पर पड़ेगा. इन देशों के किसान लागत बढ़ने पर खाद का इस्तेमाल कम कर सकते हैं, जबकि विकसित देशों के किसानों के पास इस स्थिति से निपटने के ज्यादा विकल्प होते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि खाद के कम इस्तेमाल से फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है. इससे बाजार में कृषि उत्पादों की आपूर्ति घटेगी और कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, उर्वरक बाजार पर दबाव इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि रूस और चीन जैसे बड़े निर्यातक देशों ने खाद के निर्यात पर कोटा और अन्य प्रतिबंध लगाए हैं. इससे वैश्विक बाजार में खाद की उपलब्धता प्रभावित हुई है और कीमतें बढ़ने का खतरा बना हुआ है.
खाद की बढ़ती कीमतों से प्रभावित होंगे ये देश
अंग्रेजी वेबसाइट बिजनेसलाइन के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि खाद की बढ़ती कीमतों से भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और यूरोपीय संघ (EU) जैसे बड़े कृषि उत्पादक और आयातक देशों में फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की एग्रीकल्चरल मार्केटिंग इंफॉर्मेशन सिस्टम (AMIS) के अनुसार, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से खाद महंगी हो रही है. इसका असर यह हो सकता है कि किसान खाद का कम इस्तेमाल करें, जिससे फसलों की पैदावार और कुल उत्पादन घट सकता है.
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सल्फर के लिए चुनौतियों का सामना कर रहा चीन
रिसर्च एजेंसी BMI (फिच सॉल्यूशंस) का कहना है कि प्रमुख कृषि बाजारों में भारत पर सबसे अधिक जोखिम है. वहीं, चीन को भी फॉस्फेट उर्वरक बनाने के लिए इस क्षेत्र से सल्फर आयात पर निर्भर रहने के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, एशिया में किसानों की आय पर पहले से दबाव है. ऐसे में खाद की ऊंची कीमतों के कारण किसान उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ाने की स्थिति में नहीं हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इनपुट लागत ऊंची बनी रही तो कृषि उत्पादन और उर्वरकों की खपत दोनों प्रभावित हो सकते हैं.
43 प्रतिशत खाद की जरूरत पहले ही पूरी
खाद की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता के बीच केंद्र सरकार का कहना है कि जुलाई से सितंबर के खरीफ सीजन में किसानों को खाद की कमी नहीं होगी. सरकार के अनुसार, खरीफ सीजन की करीब 43 प्रतिशत खाद की जरूरत पहले ही पूरी की जा चुकी है और बाकी मांग घरेलू उत्पादन से पूरी होने की उम्मीद है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की संस्था AMIS के मुताबिक, जून में वैश्विक उर्वरक बाजार में कुछ राहत के संकेत मिले हैं. हॉर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बेहतर होने और ऊर्जा की कीमतों में नरमी आने से खाद की कीमतों पर दबाव कुछ कम हुआ है. हालांकि, कई देशों में खाद अब भी किसानों की पहुंच से महंगी बनी हुई है.
अनाज उत्पादन 2 प्रतिशत घट सकता है
एफएओ से जुड़े AMIS का अनुमान है कि भारत में 2026 में अनाज उत्पादन करीब 2 प्रतिशत घट सकता है, जबकि थाईलैंड में 2026 में 3 प्रतिशत और 2027 में 2 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है. इसकी मुख्य वजह खाद की ऊंची कीमतों के कारण किसानों द्वारा उर्वरकों का कम इस्तेमाल करना है. वहीं, रिसर्च एजेंसी BMI के अनुसार, विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जून में वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतों में करीब 4.6 प्रतिशत की कमी आई है. हालांकि, यूरिया के दाम कुछ नरम जरूर हुए हैं, लेकिन अभी भी सामान्य स्तर से ऊंचे बने हुए हैं.
कीमतों में तेज उछाल की संभावना
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव का असर कृषि जिंस (एग्री-कमोडिटी) बाजार पर जरूर पड़ रहा है, लेकिन फिलहाल कीमतों में तेज उछाल की संभावना कम है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की संस्था AMIS के अनुसार, जून में चीन में चावल को छोड़कर अधिकांश फसलों और क्षेत्रों में उर्वरक लागत में कमी दर्ज की गई. भारत के अलावा अन्य देशों में मांग कमजोर रहने और आपूर्ति बढ़ने से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की कीमतों में भी नरमी आई है.
वैश्विक हालात कमोडिटी बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण
ING Think के विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात कमोडिटी बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण हैं. हालांकि, आपूर्ति, मांग, भंडार और वैश्विक आर्थिक स्थिति अभी अपेक्षाकृत बेहतर है. यही वजह है कि 2007, 2010 और 2020 की तरह कृषि जिंसों की कीमतों में अचानक बड़ी तेजी आने की आशंका फिलहाल कम है. विशेषज्ञों के मुताबिक, 2025-26 में कई कृषि फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था. इसके कारण 2026-27 विपणन वर्ष की शुरुआत में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है, जिससे आपूर्ति को लेकर चिंता कम हुई है और बाजार में कीमतों पर दबाव सीमित रहने की संभावना है.