बेबी कॉर्न से होगी बंपर कमाई, वैज्ञानिक भी दे रहे हैं खेती करने की सलाह.. 60 दिनों में फसल तैयार

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने किसानों को धान के विकल्प के रूप में बेबी कॉर्न की खेती अपनाने की सलाह दी है. 60-65 दिन में तैयार होने वाली यह फसल कम पानी में अच्छी आय दे सकती है. घरेलू और निर्यात बाजार में बढ़ती मांग के बीच पीएयू ने किसानों को बेबी कॉर्न और कम अवधि वाली धान किस्मों को बढ़ावा देने की अपील की है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 2 Jul, 2026 | 10:24 AM

Baby Corn Cultivation: फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने किसानों को बेबी कॉर्न की खेती अपनाने की सलाह दी है. विश्वविद्यालय का कहना है कि यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और किसानों को जल्दी आय दिला सकती है. खासकर शहरों और शहरी क्षेत्रों के आसपास के किसानों के लिए बेबी कॉर्न एक लाभदायक विकल्प साबित हो सकता है.

पीएयू के विशेषज्ञों के अनुसार, बेबी कॉर्न की फसल केवल 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है. इसकी कटाई के बाद बचा हरा पौधा पशुओं के लिए पौष्टिक चारे  के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे डेयरी किसानों को भी अतिरिक्त फायदा मिलता है. विश्वविद्यालय का कहना है कि बेबी कॉर्न पंजाब की फसल विविधीकरण योजना के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसकी अवधि कम होती है. किसान गेहूं और बासमती धान के बीच एक अतिरिक्त फसल ले सकते हैं या अप्रैल से सितंबर के बीच एक धान की फसल की जगह दो से तीन फसलें उगा सकते हैं. इससे जमीन का बेहतर उपयोग होगा, पानी की बचत होगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी.

किसानों के लिए लाभदायक फसल बनती जा रही है

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, पीएयू ने कहा कि बेबी कॉर्न की मांग घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों के लिए यह एक लाभदायक फसल बनती जा रही है. पहले बेबी कॉर्न का आयात मुख्य रूप से थाईलैंड से किया जाता था और इसका उपयोग बड़े होटलों व रेस्तरां में होता था. लेकिन अब भारत में भी इसकी खेती तेजी से बढ़ रही है. होटल, एयरलाइंस, शिपिंग कंपनियों और यूरोपीय देशों में बढ़ती मांग के साथ-साथ निजी कंपनियों की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग योजनाओं ने किसानों के लिए आय के नए अवसर पैदा किए हैं.

क्या होता है बेबी कॉर्न मक्का

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के अनुसार, बेबी कॉर्न मक्का  का कोमल और अपरिपक्व भुट्टा होता है, जिसे रेशे (सिल्क) निकलने के दो से तीन दिन के भीतर तोड़ लिया जाता है. चूंकि यह भुट्टा विकास के दौरान पूरी तरह पत्तियों से ढका रहता है, इसलिए इस पर कीटों और बीमारियों का असर कम होता है. यही वजह है कि इसमें कीटनाशकों की जरूरत भी कम पड़ती है और यह अपेक्षाकृत सुरक्षित फसल मानी जाती है.

बेबी कॉर्न मक्का का प्रति एकड़ उत्पादन

खेती के लिए पीएयू ने अपनी विकसित सिंगल-क्रॉस हाइब्रिड किस्म ‘पंजाब बेबी कॉर्न-1’ की सिफारिश की है. यह किस्म एक समान आकार के भुट्टे देती है और प्रति एकड़ लगभग 8.4 क्विंटल बिना छिलके वाला बेबी कॉर्न उत्पादन कर सकती है. विश्वविद्यालय ने किसानों को अप्रैल से अगस्त के पहले सप्ताह तक इसकी बुवाई करने और बेहतर गुणवत्ता के लिए रेशे निकलने के दो से तीन दिन के भीतर कटाई करने की सलाह दी है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने बेबी कॉर्न को किसानों के लिए लाभदायक और पोषण से भरपूर फसल बताया है. विश्वविद्यालय के अनुसार, बेबी कॉर्न में प्रोटीन, विटामिन, कैल्शियम, आयरन और फॉस्फोरस भरपूर मात्रा में होते हैं. साथ ही इसमें कार्बोहाइड्रेट कम, फाइबर अधिक और वसा (फैट) नहीं के बराबर होता है, जिससे इसकी मांग लगातार बढ़ रही है.

पंजाब में गर्मी और कम बारिश

इस बीच, पंजाब में गर्मी, कम बारिश और बढ़ती जल कमी  को देखते हुए पीएयू के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने वैज्ञानिकों को किसानों के बीच अधिक सक्रिय रहने और खरीफ सीजन की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने कहा कि प्रतिकूल मौसम के कारण धान की रोपाई में देरी हो सकती है, फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है और कीट व रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है. डॉ. गोसल ने वैज्ञानिकों को पीएयू द्वारा अनुशंसित कम अवधि और कम पानी में तैयार होने  वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देने के निर्देश दिए.

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Published: 2 Jul, 2026 | 10:21 AM

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