सरकार ने गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 का ड्राफ्ट वापस लिया, किसानों के विरोध के बाद लिया ये फैसला

केंद्र सरकार ने 1966 के गन्ना (नियंत्रण) आदेश में संशोधन का ड्राफ्ट वापस ले लिया है. यह फैसला किसानों, गुड़-खांडसारी इकाइयों और मिलों के विरोध के बाद लिया गया. सरकार ने कहा कि मिले सुझावों के आधार पर इस पर फिर से विचार किया जाएगा. पिछले महीने सरकार ने इन संशोधनों का ड्राफ्ट जारी किया था, जिस पर 20 मई तक जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी गई थीं.

Kisan India
नोएडा | Published: 30 May, 2026 | 07:55 AM

Sugarcane Cultivation: केंद्र सरकार ने 1966 के गन्ना (नियंत्रण) आदेश में प्रस्तावित संशोधन का ड्राफ्ट वापस ले लिया है. यह फैसला किसानों के संगठनों, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों, असंगठित गुड़ और खांडसारी इकाइयों तथा कुछ चीनी मिल मालिकों के विरोध के बाद लिया गया है. सरकारी आदेश में कहा गया है कि राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों से मिले सुझावों और टिप्पणियों के आधार पर इस ड्राफ्ट पर फिर से विचार करने की जरूरत है, इसलिए गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 के ड्राफ्ट को वापस लिया जाता है.

पिछले महीने सरकार ने इन संशोधनों का ड्राफ्ट जारी किया था, जिस पर 20 मई तक जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी गई थीं. इस ड्राफ्ट के एक प्रावधान को लेकर किसानों के बीच खास नाराजगी देखी गई. इसमें गुड़ (gur) और खांडसारी इकाइयों को नियमों के दायरे में लाने की बात थी. इसके तहत इन इकाइयों के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य करने और किसानों को गन्ने का न्यूनतम उचित और लाभकारी मूल्य  (FRP) देना जरूरी करने का प्रस्ताव रखा गया था. खांडसारी गन्ने से बनने वाली एक पारंपरिक, बिना रिफाइंड की हुई चीनी होती है. अनुमान के अनुसार, भारत में हर साल पैदा होने वाले लगभग 435 मिलियन टन गन्ने का करीब 31 प्रतिशत हिस्सा गुड़, खांडसारी और गुड़ (जग्गरी) बनाने वाली इकाइयों में इस्तेमाल होता है. यह आंकड़ा हर साल बदलता रहता है.

इकाइयां ज्यादातर छोटे और सूक्ष्म स्तर के उद्यम होते हैं

गुड़ और खांडसारी बनाने वाली इकाइयां ज्यादातर छोटे और सूक्ष्म स्तर के उद्यम होते हैं. ये अक्सर खुद गन्ना किसानों या स्थानीय उद्यमियों द्वारा चलाए जाते हैं. जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 10- 12 प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में इन इकाइयों की संख्या सबसे अधिक है. ये इकाइयां आमतौर पर पारंपरिक ‘कोल्हू-क्रशर’ की मदद से गन्ना पेराई का काम करती हैं.

किसानों और खांडसारी उद्योग के लिए नुकसानदायक

अनुमान के मुताबिक, हर बड़े गन्ना उत्पादक जिले में ऐसी करीब 2,000 से 3,000 छोटी इकाइयां मौजूद हैं. इनका सबसे ज्यादा केंद्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में है, जिसमें मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा और बरेली जैसे जिले शामिल हैं. किसान संगठनों ने ड्राफ्ट के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि इसमें गुड़ और खांडसारी जैसी असंगठित इकाइयों  को नियंत्रित करने के साथ-साथ कुछ ऐसे दंडात्मक नियम भी शामिल हैं, जो गन्ना किसानों और खांडसारी उद्योग दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं.

कोल्हू भी उन्नत रोलर्स का इस्तेमाल करते हैं

भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) ने केंद्र सरकार को लिखे पत्र में कहा कि ड्राफ्ट में ‘क्रशर’ की परिभाषा में खामी है. संगठन का कहना है कि सभी क्रशर और पारंपरिक कोल्हू को एक ही श्रेणी में रखा जाना चाहिए, क्योंकि आज के समय में आधुनिक कोल्हू भी उन्नत रोलर्स का इस्तेमाल करते हैं, जो खांडसारी इकाइयों के बराबर या उनसे बड़े होते हैं. किसानों का यह भी सुझाव है कि वर्गीकरण रोलर के आकार के बजाय पेराई क्षमता के आधार पर होना चाहिए, क्योंकि अब पशु-चालित कोल्हू लगभग खत्म हो चुके हैं.

‘शक्कर’ असल में पिसा हुआ गुड़ है

इसके अलावा, यूनियन ने ‘शक्कर’ (गुड़ पाउडर) को राब (गुड़ से बनने वाला पारंपरिक सिरप) और खांडसारी चीनी के साथ एक ही श्रेणी में रखने पर भी आपत्ति जताई है. किसान यूनियन का कहना है कि ‘शक्कर’ असल में पिसा हुआ गुड़ है, इसलिए इसे चीनी के उत्पाद के बजाय गुड़ से जुड़ा उत्पाद माना जाना चाहिए. इसके साथ ही संगठन ने गन्ना मूल्य तय करने की मौजूदा प्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि फिलहाल उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) मुख्य रूप से चीनी की रिकवरी के आधार पर तय किया जाता है, जबकि अब चीनी मिलें कई अन्य स्रोतों से भी कमाई कर रही हैं. इनमें इथेनॉल उत्पादन, कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG), मोलासेस, बैगास से बिजली उत्पादन और प्रेस मड जैसे उप-उत्पाद शामिल हैं.

इन इकाइयों को भी किसानों को FRP देने का प्रावधान है

यूनियन ने मांग की है कि इन सभी सह-उत्पादों से होने वाली आय को भी गन्ने की कीमत तय करने में शामिल किया जाए. गुड़ और खांडसारी  इकाइयों के नियमन को लेकर किसानों का कहना है कि ड्राफ्ट के सेक्शन 4 में इन इकाइयों को भी किसानों को FRP देने का प्रावधान है. उनका तर्क है कि हालांकि खांडसारी उद्योग आमतौर पर FRP से ज्यादा भुगतान करता है, लेकिन यह भुगतान खांडसारी चीनी या गुड़ की रिकवरी से जुड़ा होता है, जो अक्टूबर-नवंबर में कम रहती है. इसी समय किसान गन्ने की कटाई करते हैं ताकि रबी (गेहूं) की बुवाई कर सकें और उन्हें तुरंत नकद भुगतान की जरूरत होती है.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

लेटेस्ट न्यूज़