यूपी में अमरूद पर उकठा-नीमैटोड का हमला, बीमारी से बाग हो रहे बर्बाद… ICAR का एक्शन प्लान शुरू
वैज्ञानिकों के अनुसार यह समस्या नर्सरियों के जरिए फैली. जब थाई या ताइवान पिंक अमरूद के पौधे लगाए गए, तो उनके साथ यह कीट भी आ गया. धीरे-धीरे ये कीट अलग-अलग जिलों में फैल गया और 2016 के बाद से इसने ज्यादा नुकसान करना शुरू कर दिया.
Guava disease: उत्तर प्रदेश में अमरूद की खेती को लंबे समय से किसानों की मजबूत आय का सहारा माना जाता रहा है, लेकिन अब यह फसल गंभीर संकट से गुजर रही है. खासकर बदायूं, प्रयागराज और लखनऊ जैसे इलाकों में अमरूद के बाग तेजी से खराब हो रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह दोहरी बीमारी है पुराना उकठा रोग और नया खतरा बनकर उभरा “रूट-नॉट नीमैटोड”. इन दोनों ने मिलकर किसानों की मेहनत पर बड़ा असर डाला है.
बीमारी ने कैसे बढ़ाई परेशानी
पहले से मौजूद उकठा रोग अमरूद के पेड़ों को कमजोर करता था, लेकिन अब नीमैटोड ने समस्या को और बढ़ा दिया है. ये बहुत छोटे कीट होते हैं, जो आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन जड़ों में घुसकर गांठें बना देते हैं. जब जड़ों में गांठ बन जाती है, तो पौधा मिट्टी से पोषण सही तरीके से नहीं ले पाता. धीरे-धीरे पौधा कमजोर होता जाता है और कुछ ही समय में सूख भी सकता है. यही वजह है कि कई बागों में नए पौधे लगने के कुछ महीनों बाद ही खराब हो रहे हैं.
नर्सरी से फैलती गई बीमारी
हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ICAR के वैज्ञानिकों के अनुसार यह समस्या नर्सरियों के जरिए फैली. जब थाई या ताइवान पिंक अमरूद के पौधे लगाए गए, तो उनके साथ यह कीट भी आ गया. धीरे-धीरे ये कीट अलग-अलग जिलों में फैल गया और 2016 के बाद से इसने ज्यादा नुकसान करना शुरू कर दिया. अब हालात यह हैं कि बड़े-बड़े अमरूद के बाग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं.
पैदावार पर बड़ा असर
इस बीमारी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ रहा है. पिछले साल जहां अमरूद का उत्पादन 45 से 50 लाख टन के बीच था, वहीं इस बार संक्रमित बागों में 15 से 45 प्रतिशत तक नुकसान देखा जा रहा है. इसका मतलब है कि किसानों की कमाई भी घट रही है और कई जगह उन्हें बागों को दोबारा तैयार करना पड़ रहा है, जिससे खर्च और बढ़ रहा है.
बड़ा क्षेत्र प्रभावित
उत्तर प्रदेश में अमरूद की खेती करीब 2.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है, जिसमें प्रयागराज का इलाका सबसे प्रमुख माना जाता है. अब यही पूरा “अमरूद बेल्ट” इस बीमारी की चपेट में आ गया है. इससे न केवल किसानों को नुकसान हो रहा है, बल्कि राज्य की कुल फल उत्पादन क्षमता भी प्रभावित हो रही है.
ICAR ने शुरू किया अभियान
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए लखनऊ स्थित ICAR-CISH संस्थान ने एक खास अभियान शुरू किया है. यह अभियान “मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर” के तहत चलाया जा रहा है. इसका उद्देश्य प्रभावित बागों को बचाना और धीरे-धीरे उन्हें फिर से उत्पादन के लायक बनाना है. खासकर बदायूं और लखनऊ जैसे इलाकों में इस पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है.
क्या हैं इलाज के तरीके
वैज्ञानिकों ने इस बीमारी से निपटने के लिए कई उपाय बताए हैं. सबसे पहले मिट्टी में दवा डालकर नीमैटोड को खत्म किया जाता है. इसके बाद जैविक उपाय अपनाए जाते हैं, जैसे ट्राइकोडर्मा और बैसिलस जैसे अच्छे बैक्टीरिया का इस्तेमाल.
इसके अलावा नीम की खली और कंपोस्ट का उपयोग करने से भी मिट्टी की सेहत सुधरती है और बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है. किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि वे ऐसी फसलें न लगाएं जो इस बीमारी को बढ़ाती हैं.
किसानों को मिल रही मदद
इस अभियान की अच्छी बात यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाली दवाओं और सामग्री का खर्च संस्थान खुद उठा रहा है. किसानों को सिर्फ वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में इन उपायों को अपनाना है. साथ ही किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे किसी भी समस्या पर सीधे वैज्ञानिकों से संपर्क करें, ताकि समय रहते समाधान मिल सके.
उम्मीद अभी भी बाकी
हालांकि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर सही समय पर सही कदम उठाए जाएं तो इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है. सरकार और वैज्ञानिक मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में अमरूद की खेती फिर से पटरी पर आ सके. किसानों के लिए यह समय थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन उम्मीद है कि सही जानकारी और सहयोग से वे इस संकट से बाहर निकल पाएंगे.