कपास से किसानों ने बनाई दूरी, रकबे में 70 फीसदी गिरावट.. अब बाजरा की कर रहे खेती

हरियाणा के महेंद्रगढ़ और आसपास के जिलों में किसान कपास से बाजरा और ग्वार की ओर बढ़ रहे हैं. गुलाबी सुंडी, बढ़ती लागत और मौसम जोखिम से कपास का रकबा घटकर सात वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है. सरकार बाजरा उत्पादन, सिंचाई तकनीक और प्रसंस्करण इकाइयों को सब्सिडी देकर प्रोत्साहित कर रही है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 10 Jun, 2026 | 01:04 PM

Millet Cultivation: हरियाणा के महेंद्रगढ़ और आसपास के जिलों में किसान तेजी से कपास की खेती से दूरी बना रहे हैं. कीटों के बढ़ते प्रकोप, महंगी खेती और मौसम की मार के कारण कई किसान अब बाजरे की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसका असर कपास के रकबे पर भी दिख रहा है, जो घटकर सात साल के सबसे निचले स्तर 2.82 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है. ऐसे में राज्य में कपास का रकबा करीब 70 प्रतिशत तक कम हो चुका है.

हालांकि, हरियाणा सरकार बाजरा की खेती को बढ़ावा दे रही है. वह किसानों को ऐसे बाजरा बीज अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जिनसे अधिक उत्पादन मिलता है और जो तेज गर्मी व बीमारियों का बेहतर सामना कर सकते हैं. इसके साथ ही अटल भूजल योजना के तहत स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई  जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे पानी की बचत होती है और कम बारिश में भी अच्छी फसल मिलती है. सबसे बड़ी बात यह है कि बाजरे को ज्यादा लाभदायक फसल बनाने के लिए हरियाणा सरकार बाजरा प्रसंस्करण इकाइयां लगाने वाले उद्यमियों को बैंक ऋण पर 7 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी दे रही है. इससे बाजरे का आटा, बिस्कुट और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वाले छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है और किसानों के लिए बाजरे की मांग भी बढ़ रही है.

कपास में गुलाबी सुंडी का खतरा

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कपास की फसल में बढ़ता गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गया है. यह कीट फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है और अब बीटी कपास भी इससे पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह गई है. बार-बार होने वाले कीट हमलों से किसानों की पैदावार घट रही है और कई बार पूरी फसल खराब हो जाती है. इससे कपास की खेती कम लाभदायक होती जा रही है. यही कारण है कि किसान अब कम जोखिम और कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली बाजरे जैसी फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं.

इस वजह से हो रही बाजरे की खेती

ऐसे दक्षिण हरियाणा के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में किसान बाजरा के साथ-साथ ग्वार की खेती  को प्राथमिकता दे रहे हैं. महेंद्रगढ़, झज्जर, भिवानी और चरखी दादरी के कई इलाकों में यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है. महेंद्रगढ़ कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में विषय विशेषज्ञ (प्रशिक्षण एवं सूचना) डॉ. सतवीर चौहान ने ‘द ट्रिब्यून’ से कहा कि दक्षिण हरियाणा की मिट्टी बाजरे की खेती के लिए अधिक उपयुक्त है. इसके विपरीत सिरसा और फतेहाबाद जैसे जिलों की मिट्टी कपास की खेती के लिए बेहतर मानी जाती है. इसी वजह से दक्षिण हरियाणा के किसान तेजी से बाजरे की खेती की ओर बढ़ रहे हैं.

भावांतर भरपाई योजना से फायदा

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कम लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और भावांतर भरपाई योजना  का लाभ मिलने के कारण बाजरा किसानों के लिए सुरक्षित और लाभकारी फसल बनता जा रहा है. इसके अलावा, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मोटे अनाज (मिलेट्स) को बढ़ावा देने से भी बाजरा उत्पादकों को फायदा मिला है. विशेषज्ञों के अनुसार, बाजरा सूखा सहन करने वाली फसल है, जिसे कम पानी और कम निवेश में उगाया जा सकता है.

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Published: 10 Jun, 2026 | 01:03 PM

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