फरवरी में गेहूं की फसल पर कीट-दीमक और चूहों का खतरा, समय रहते करें बचाव
फरवरी में मौसम बदलने के साथ गेहूं की फसल पर चेपा, दीमक और चूहों का खतरा बढ़ जाता है. किसानों को हल्की सिंचाई, नियमित निगरानी और समय पर दवा का प्रयोग करने की सलाह दी जा रही है, ताकि फसल सुरक्षित रहे और पैदावार प्रभावित न हो.
Wheat Crop Care: ठंड अब धीरे-धीरे कम हो रही है और धूप तेज होने लगी है. मौसम का यही बदलाव गेहूं की फसल के लिए सबसे नाजुक समय होता है. खेत में हल्की सी लापरवाही भी पैदावार को घटा सकती है. कहीं नमी की कमी तो कहीं कीटों का हमला किसानों की चिंता बढ़ा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि किसान समय रहते सही कदम उठाएं, ताकि मेहनत की फसल सुरक्षित रह सके.
बदलते मौसम में क्यों बढ़ जाता है खतरा
फरवरी में दिन की धूप तेज होने लगती है. इससे खेत की मिट्टी जल्दी सूखती है और फसल में नमी की कमी हो सकती है. अगर समय पर हल्की सिंचाई न की जाए, तो पौधे कमजोर हो सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ज्यादा पानी दे दिया जाए. अधिक सिंचाई से गेहूं की फसल गिर सकती है, जिसे लॉजिंग कहते हैं. फसल गिरने से बाली में दाना सही से नहीं भरता और उत्पादन कम हो जाता है. इसलिए इस समय संतुलित और हल्की सिंचाई ही सही तरीका है.
चेपा, दीमक और चूहे बन सकते हैं बड़ी समस्या
फरवरी के महीने में गेहूं की फसल पर चेपा (एफिड), दीमक और चूहों का प्रकोप बढ़ जाता है. चेपा पौधों का रस चूसता है, जिससे पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और बाली कमजोर हो जाती है. दीमक जड़ों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे पौधा सूख सकता है. वहीं चूहे खेत में बिल बनाकर पौधों को काट देते हैं और बालियों को भी नुकसान पहुंचाते हैं. अगर समय रहते इनकी पहचान न की जाए, तो नुकसान तेजी से बढ़ सकता है. इसलिए किसानों को रोजाना खेत का चक्कर लगाकर फसल को ध्यान से देखना चाहिए.
सही दवा और सही मात्रा का रखें ध्यान
अगर खेत में चेपा दिखाई दे, तो उसके लिए क्विनालफॉस दवा का छिड़काव किया जा सकता है. दीमक की समस्या हो तो क्लोरपाइरीफॉस का प्रयोग किया जा सकता है. चूहों के लिए जिंक फॉस्फाइड का इस्तेमाल कारगर माना जाता है. ध्यान रहे कि दवा हमेशा सही मात्रा में ही इस्तेमाल करें. ज्यादा दवा डालने से खर्च बढ़ता है और फसल पर भी बुरा असर पड़ सकता है. छिड़काव सुबह या शाम के समय करना बेहतर रहता है, ताकि दवा का असर ठीक से हो.
छोटी सावधानी, बड़ा फायदा
इस मौसम में सबसे जरूरी है नियमित निगरानी. खेत में नमी बनी रहे, लेकिन पानी जमा न हो. पौधों की पत्तियों का रंग बदल रहा हो या कीट दिखें, तो तुरंत कार्रवाई करें. अगर किसान समय पर हल्की सिंचाई, संतुलित खाद और सही दवा का इस्तेमाल करें, तो फसल सुरक्षित रहेगी. इससे बाली में दाना अच्छा भरेगा और पैदावार भी बढ़ेगी.