Tip Of the day: एक छोटी गलती से गेहूं की फसल गिर सकती है, जानिए कैसे करें सिंचाई और देखभाल

गेहूं में बाली निकलने का समय बेहद संवेदनशील होता है, जब सिंचाई और पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान जरूरी होता है. लापरवाही से फसल गिर सकती है और दानों का विकास रुक सकता है. सही नमी, संतुलित खाद और रोग नियंत्रण से पैदावार सुरक्षित रहती है. किसानों को इस समय खेत की निगरानी जरूरी है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 9 Feb, 2026 | 06:00 AM

Wheat Crop: खेत में लहलहाती गेहूं की फसल हर किसान के लिए उम्मीद और मेहनत का प्रतीक होती है. महीनों की मेहनत के बाद जब पौधों में बाली निकलती है, तो यह समय फसल के लिए सबसे अहम माना जाता है. इसी दौरान की गई छोटी-सी गलती भी उत्पादन पर बड़ा असर डाल सकती है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बाली निकलने की अवस्था में सही सिंचाई, पोषण और रोग नियंत्रण का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है, ताकि फसल सुरक्षित रहे और दाने अच्छी तरह विकसित हो सकें.

बाली निकलते समय सिंचाई में बरतें सावधानी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं में बाली  निकलने के समय पौधों का भार ऊपर की ओर बढ़ जाता है. ऐसे में तेज हवा या ज्यादा पानी के साथ सिंचाई करने से फसल गिर सकती है, जिसे “लॉजिंग” कहा जाता है. फसल गिरने से दानों का विकास रुक जाता है और पैदावार कम हो सकती है. इसलिए इस समय हमेशा शांत मौसम या शाम के समय हल्की सिंचाई करने की सलाह दी जाती है. खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए, बल्कि केवल नमी बनाए रखना जरूरी है.

मिट्टी की नमी जांचना है जरूरी

इस अवस्था में सिंचाई करने से पहले खेत की मिट्टी की नमी  जरूर जांच लेनी चाहिए. अगर मिट्टी को हाथ में लेकर दबाने पर लड्डू नहीं बनता, तभी सिंचाई करना सही माना जाता है. ज्यादा पानी देने से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और पौधे पीले पड़ सकते हैं. यदि संभव हो तो स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करना बेहतर माना जाता है, क्योंकि इससे पानी समान रूप से फैलता है और फसल गिरने का खतरा कम रहता है.

सही खाद से होगा दानों का बेहतर विकास

बाली निकलने के समय पौधों को फास्फोरस और पोटाश  की ज्यादा जरूरत होती है. इस समय इन तत्वों का स्प्रे करने से दानों का वजन और चमक बेहतर हो सकती है. किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि इस अवस्था में यूरिया का इस्तेमाल न करें. यूरिया देने से पौधों की बढ़वार फिर से तेज हो जाती है और तना कमजोर होकर गिर सकता है, जिससे दानों का भराव प्रभावित हो सकता है.

रोग और तापमान पर भी रखें नजर

इस समय तापमान बढ़ने से दानों पर असर पड़ सकता है. हल्की सिंचाई खेत का तापमान संतुलित रखती है और पौधों को गर्मी के प्रभाव  से बचाती है. सिंचाई के बाद खेत में नमी बढ़ने से चेपा और रतुआ जैसे रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है. इसलिए किसानों को नियमित रूप से फसल की जांच करते रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर दवा का छिड़काव करना चाहिए. बाली निकलने के बाद दाने सख्त होने लगें, तब अंतिम सिंचाई करने पर विचार करना चाहिए. बहुत देर से सिंचाई करने से दानों की गुणवत्ता खराब  हो सकती है. सही समय पर सही देखभाल से गेहूं की फसल अच्छी पैदावार दे सकती है और किसान की मेहनत सफल हो सकती है.

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Published: 9 Feb, 2026 | 06:00 AM

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