कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से बचाने की कम उर्वरक वाली ‘खास’ टेक्निक

इस टेक्निक में किसान 10 से 15 गुना कम उर्वरकों का प्रयोग करते हैं. यहां तक कि खेतों में कीट दिखाई देने पर भी किसान कीटनाशकों का उपयोग करने से बचते हैं. किसानों के बीच यह ट‍ेक्निक काफी लोकप्रिय हो रही है.

Kisan India
Noida | Published: 15 Mar, 2025 | 03:33 PM

राजस्‍थान, पंजाब और हरियाणा में गुलाबी सुंडी से ऐसे हो रही है कपास की फसल की रक्षापंजाब, हरियाणा और राजस्‍थान के किसान इन दिनों एक ऐसी टेक्निक को अपना रहे हैं, जो खेती में कारगर साबित हो रही है. इस टेक्निक में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता और उपज भी ज्‍यादा हासिल होती है. पंजाब और हरियाणा के ऐसे किसान जो कपास की खेती कर रहे हैं, उनके बीच यह ट‍ेक्निक काफी लोकप्रिय हो रही है. उनकी मानें तो इसकी वजह से अब उन्‍हें गुलाबी सुंडी के हमले से घबराने की जरूरत नहीं है.

10 से 15 गुना कम उर्वरकों का प्रयोग

अखबार इंडियन एक्‍सप्रेस के अनुसार इस टेक्निक में किसान 10 से 15 गुना कम उर्वरकों का प्रयोग करते हैं. यहां तक कि खेतों में कीट दिखाई देने पर भी किसान कीटनाशकों का उपयोग करने से बचते हैं. अखबार के अनुसार ये सभी किसान ‘डॉ. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता पाठशाला’यानी एक पेस्‍ट पाठशाला के तौर पर चल रहे आंदोलन का हिस्सा हैं. इसे हरियाणा के पूर्व कृषि विकास अधिकारी डॉ. सुरेन्द्र दलाल ने साल 2006 में शुरू किया था. उनके इस तरीके में किसानों को बहुत कम उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाता है. इससे उनकी उपज में सुधार होता है और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता है.

बताया जाता है कीटों के बारे में

किसानों के हवाले से अखबार ने लिखा है कि डॉक्‍टर दलाल खेती के तहत किसानों को कीटों की पहचान करना सिखाते हैं. उनकी क्‍लासेज किसानों के लिए पूरी तरह से फ्री होती हैं. एक बार जब किसान कीटों को पहचानना सीख जाते हैं तो उन्हें उनसे डर नहीं लगता. जब पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट, जो शाकाहारी होते हैं, खेतों में प्रवेश करते हैं, तो यह निश्चित है कि प्राकृतिक शिकारी, जो मांसाहारी होते हैं और शाकाहारी कीटों को खाते हैं, वे भी कीटों की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने के लिए आएंगे. डॉक्‍टर दलाल की पाठशाला पंजाब एग्रो, ज्ञान विज्ञान और खेती विरासत मिशन से जुड़ी है. यह किसानों को कीटों और पौधों के स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करते हैं.

गुलाबी सुंडी से परेशान किसान

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के हजारों किसानों ने ऐसे समय में यह तकनीक अपनाई है, जब गुलाबी सुंडी हर साल फसलों को नुकसान पहुंचा रही है. गुलाबी सुंडी के हमले की वजह से वार्षिक पैदावार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. कई किसान या तो कपास की खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं या फिर उन्‍हें खेती के क्षेत्र को कम करना पड़ रहा है. कुछ किसान तो नए कीट-प्रतिरोधी बीज प्रौद्योगिकियों की मांग तक कर रहे हैं.

साल 2024 में, उत्‍तरी क्षेत्र में कपास उगाने वाले क्षेत्र में खासतौर पर कमी आई है. यह साल 2023 में 18.80 लाख हेक्टेयर से घटकर 2024 में 13.22 लाख हेक्टेयर पर आ गया है. इसमें सबसे ज्‍यादा असर पंजाब पर पड़ा है जिसने इतिहास में कपास की खेती के तहत सबसे कम क्षेत्र दर्ज किया है. पंजाब में साल 2024 में एक लाख हेक्टेयर से भी कम क्षेत्र में कपास की खेती की गई है.

कौन से हैं वो खास उर्वरक

कपास उगाने के पूरे मौसम में पौधों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए किसान पारंपरिक रसायन या उर्वरकों से अलग, खास मिश्रणों का प्रयोग करते हैं. उपयोग किए जाने वाले मिश्रण में दलाल घोल, रेहरू घोल, परिवहन घोल और पोटाश घोल शामिल हैं. दलाल घोल में 2.5 किलो डीएपी, 2.5 किलो यूरिया और 0.5 किलो जिंक होता है जिसे 100 लीटर पानी में मिलाया जाता है. इसे पौधों पर लगाया जाता है, अगर पौधे छोटे हैं तो एक बैच एक एकड़ के लिए पर्याप्त है. बड़े पौधों के लिए, मात्रा दोगुनी की जा सकती है.

रेहरू घोल में 2.25 किलोग्राम डीएपी, 1.5 किलोग्राम जिंक, 2.5 किलोग्राम यूरिया, 100 लीटर पानी और किसी भी शैम्पू के तीन पाउच शामिल हैं. वहीं, परिवहन घोल में 1 किलोग्राम मैग्नीशियम सल्फेट, 2.5 किलोग्राम यूरिया, 0.5 किलोग्राम जिंक और 100 लीटर पानी होता है.
पोटाश घोल का प्रयोग फसल पकने के समय किया जाता है और यह कपास के बीज को विकसित करने में मदद करता है.

जबकि दलाल और रेहरू मिश्रण को बारिश के बाद या जब पानी उपलब्ध हो, बुवाई के 45 दिन बाद लगाया जाता है. परिवहन घोल का छिड़काव अगस्त में किया जाता है, जो कपास की पहली फसल से लगभग एक महीने पहले होता है.

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