Heatwave agriculture impact: भारत में बढ़ती गर्मी अब सिर्फ असहज मौसम नहीं रही, बल्कि यह सीधे खेती और किसानों की आजीविका को प्रभावित करने लगी है. हाल ही में खाद्य और कृषि संगठन और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले समय में हीटवेव यानी भीषण गर्मी भारत में धान (चावल) उत्पादन के लिए बड़ा खतरा बन सकती है. रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो खेती की स्थिति और भी कठिन हो सकती है.
हीटवेव क्या है और क्यों बढ़ रही है समस्या
रिपोर्ट के अनुसार, हीटवेव का मतलब है लंबे समय तक असामान्य रूप से ज्यादा गर्मी पड़ना, जब दिन और रात दोनों का तापमान सामान्य से ऊपर बना रहता है. पिछले 50 सालों में दुनिया भर में ऐसी गर्मी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. अब यह सिर्फ कुछ दिनों की परेशानी नहीं, बल्कि कई जगहों पर हफ्तों और महीनों तक चलने वाली स्थिति बनती जा रही है. इसका असर सीधे फसलों, मिट्टी और पानी पर पड़ता है, जिससे खेती की पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है.
सबसे ज्यादा खतरा इन इलाकों में
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के गंगा और सिंधु नदी के आसपास के इलाके सबसे ज्यादा खतरे में हैं. इन क्षेत्रों में बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और यहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है. अगर यहां तापमान ज्यादा बढ़ता है, तो चावल की पैदावार घट सकती है, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है.
2022 की गर्मी ने दी थी चेतावनी
रिपोर्ट में 2022 की गर्मी का उदाहरण भी दिया गया है, जब देश के कई हिस्सों में असामान्य तापमान देखा गया था. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में गर्मी ने फसलों को नुकसान पहुंचाया था. उस समय सिर्फ फसल ही नहीं, बल्कि फल, सब्जियां और पशुपालन भी प्रभावित हुए थे. कम बारिश और ज्यादा गर्मी ने मिलकर खेती को काफी नुकसान पहुंचाया था.
सिर्फ फसल ही नहीं, पशुधन भी प्रभावित
भीषण गर्मी का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है. इससे पशुओं पर भी दबाव बढ़ता है. गाय-भैंस जैसे पशु ज्यादा गर्मी में कम दूध देते हैं, वहीं मुर्गियों और अन्य पशुओं की सेहत पर भी असर पड़ता है. मछलियों पर भी गर्मी का असर होता है, क्योंकि पानी का तापमान बढ़ने से उसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे उनका जीवन प्रभावित होता है.
खेती पर बढ़ता दबाव
विशेषज्ञों का कहना है कि अब खेती का पूरा ढांचा बदल रहा है. पहले जहां मौसम अनुमानित होता था, अब वह अनिश्चित हो गया है.
सेलेस्टे साउलो के अनुसार, अत्यधिक गर्मी अब खेती की कमजोरियों को और बढ़ा रही है. यह पानी की कमी, सूखा और कीटों के फैलाव जैसी समस्याओं को भी बढ़ा देती है.
क्या हो सकते हैं समाधान
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इस बदलते मौसम के साथ खेती के तरीके भी बदलने होंगे. किसानों को ऐसी किस्मों की खेती करनी होगी जो ज्यादा गर्मी सहन कर सकें. बुवाई और कटाई के समय में बदलाव करना होगा. इसके साथ ही अर्ली वार्निंग सिस्टम यानी पहले से चेतावनी देने वाली व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है, ताकि किसान समय रहते तैयारी कर सकें.
सरकार और किसानों की भूमिका
इस चुनौती से निपटने के लिए सिर्फ किसानों की नहीं, बल्कि सरकार और वैज्ञानिकों की भी अहम भूमिका है. नई तकनीक, बेहतर बीज और मौसम की सटीक जानकारी किसानों तक पहुंचाना जरूरी है. साथ ही उन्हें प्रशिक्षण देकर बदलते हालात के अनुसार खेती करने के लिए तैयार करना होगा.