क्लाइमेट स्मार्ट खेती से 23 फीसदी बढ़ी किसानों की आय, लागत 20 फीसदी कम घटी… ITC का दावा

धान की डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक और गेहूं की जीरो टिलेज पद्धति अपनाने वाले किसानों में पारंपरिक खेती की तुलना में लागत में 20 फीसदी से अधिक कमी, लगभग 10 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि और 23 से अधिक प्रतिशत शुद्ध आय बढ़ने के संकेत मिले हैं.

Kisan India
नोएडा | Published: 30 Jun, 2026 | 05:22 PM

मौसम का बदलता मिजाज खेती के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. कभी सूखा तो कभी बेमौसम बारिश किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं. ऐसे में खेती को जलवायु के हिसाब से ढालने यानी क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर (CSA) पर जोर बढ़ रहा है. आईटीसी ने अपनी सालाना रिपोर्ट 2025-26 में दावा किया है कि इस मॉडल को अपनाने वाले किसानों की खेती की लागत 20 फीसदी से ज्यादा कम हुई है, जबकि उनकी शुद्ध आय में 23 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

17 राज्यों के 12 लाख से ज्यादा किसान जुड़े

रिपोर्ट के मुताबिक, यह कार्यक्रम अभी 17 राज्यों के 113 जिलों में चल रहा है. इसके दायरे में 31.93 लाख एकड़ कृषि जमीन और 12.09 लाख किसान आ चुके हैं. इनमें 2.27 लाख महिला किसान भी शामिल हैं. कंपनी का कहना है कि यह पहल किसानों को बदलते मौसम से होने वाले नुकसान को कम करने और खेती को ज्यादा टिकाऊ बनाने पर केंद्रित है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि धान की डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक और गेहूं की जीरो टिलेज पद्धति अपनाने वाले किसानों में पारंपरिक खेती की तुलना में लागत में 20 फीसदी से अधिक कमी, लगभग 10 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि और 23 से अधिक प्रतिशत शुद्ध आय बढ़ने के संकेत मिले हैं.

मिट्टी की सेहत और नई तकनीकों पर जोर

मिट्टी की सेहत सुधारने पर भी जोर दिया गया है. इसके लिए बीते साल 5,210 नए कंपोस्ट यूनिट बनाए गए. अब इनकी कुल संख्या 72,510 हो गई है. किसानों तक नई तकनीक और जानकारी पहुंचाने के लिए 13,500 किसान फील्ड स्कूल और 13,300 से ज्यादा चौपाल प्रदर्शन खेत (CPK) भी लगाए गए.

रिपोर्ट के अनुसार, 2,150 एग्री बिजनेस सेंटर किसानों को खेती से जुड़ी सलाह, कृषि ऋण, सामूहिक रूप से बीजखाद की खरीद और कृषि यंत्र किराये पर लेने जैसी सुविधाएं दे रहे हैं. इनमें 468 सेंटर पूरी तरह महिला संचालित हैं.

सात हजार से ज्यादा गांव बने स्मार्ट विलेज कार्यक्रम का हिस्सा

क्लाइमेट स्मार्ट विलेज (CSV) कार्यक्रम के तहत अब तक 7,055 गांवों को जोड़ा गया है. इन गांवों में जलवायु के अनुकूल खेती, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल, आजीविका के नए विकल्प और किसानों को संस्थागत सहयोग देने पर काम किया जा रहा है. इसके अलावा पिछले एक साल में किसानों को केंद्र और राज्य सरकार की छह प्रमुख योजनाओं से जोड़ने के लिए 28.31 लाख नए लिंकेज बनाए गए. इस तरह कुल लिंकेज की संख्या 70 लाख से ज्यादा हो गई है.

बिहार में मखाना और मध्य प्रदेश में क्लाइमेट स्मार्ट गांव पर फोकस

बिहार में मखाना विकास कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है. यह कार्यक्रम राज्य के छह जिलों के 214 गांवों में लागू है, जहां 7,100 किसान और 23,150 एकड़ क्षेत्र इससे जुड़ा है. यहां किसानों को सबौर मखाना-1 और स्वर्ण वैदेही जैसी उन्नत किस्मों के साथ बेहतर पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी दी जा रही है. साथ ही 1,700 किसानों को मखाना विकास योजना, पीएमकिसान सम्मान निधि और दूसरी सरकारी योजनाओं से भी जोड़ा गया है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मध्य प्रदेश में जल संरक्षण और क्लाइमेट स्मार्ट विलेज कार्यक्रम के तहत 8,200 गांवों में प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग दिया गया. वहीं 2,184 किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के साथ काम किया जा रहा है, जिनमें 31 महिला एफपीओ हैं.

ड्रोन तकनीक और सुरक्षित खेती पर भी जोर

आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के 513 गांवों में चल रहे आदर्श ग्राम कार्यक्रमके तहत किसानों को सुरक्षित खेती के तौरतरीके, पीपीई किट और ड्रोन से कृषि रसायनों के छिड़काव जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है.

मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए वर्ष के दौरान 5,210 नए कंपोस्ट यूनिट बनाए गए, जिससे इनकी कुल संख्या बढ़कर 72,510 हो गई. वहीं किसानों तक नई तकनीकों और जानकारी पहुंचाने के लिए 13,500 किसान फील्ड स्कूल तथा 13,300 से अधिक चौपाल प्रदर्शन खेत (CPK) संचालित किए गए.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2,150 एग्री बिजनेस सेंटर किसानों को कृषि सलाह, कृषि ऋण से जोड़ने, सामूहिक इनपुट खरीद और कृषि यंत्र किराये पर उपलब्ध कराने जैसी सेवाएं दे रहे हैं. इनमें 468 सेंटर विशेष रूप से महिला संचालित हैं.

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