कश्मीर में सेब की खेती पर दोहरी मार, हाई-डेंसिटी बागों के बीच घट रही खेती की जमीन

Kashmir Apple Farming: कश्मीर में किसान हाई-डेंसिटी सेब बागवानी से कम जमीन में ज्यादा उत्पादन और कमाई की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन दूसरी ओर सेब के बागों की जमीन पर घर, दुकान, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और अन्य व्यावसायिक निर्माण बढ़ रहा है. श्रीनगर के आसपास शहरीकरण के कारण बागवानी भूमि पर दबाव बढ़ा है.

नोएडा | Published: 29 Aug, 2026 | 08:42 AM

Apple Farming Kashmir: कश्मीर घाटी की पहचान सिर्फ अपनी खूबसूरत वादियों से नहीं, बल्कि सेब के बागों से भी है. यहां की बड़ी आबादी की कमाई और रोजगार बागवानी पर निर्भर है. किसान अब पारंपरिक बागवानी के साथ हाई-डेंसिटी सेब की खेती को अपना रहे हैं, ताकि कम जमीन में ज्यादा उत्पादन हासिल किया जा सके. लेकिन इसी बीच बागों की जमीन पर घर, दुकान और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने लगी हैं. इससे कश्मीर की बागवानी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता पैदा हो रही है.

कम जमीन में ज्यादा सेब उगाने की कोशिश

हाई-डेंसिटी बागवानी में कम दूरी पर ज्यादा पौधे लगाए जाते हैं. इसके लिए किसानों को बेहतर किस्म के पौधों के साथ सिंचाई, सपोर्ट सिस्टम और दूसरी सुविधाओं पर निवेश करना पड़ता है. इसका मकसद कम क्षेत्रफल से ज्यादा उत्पादन और बेहतर कमाई हासिल करना है. बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर के कई किसान इसी तकनीक की तरफ बढ़ रहे हैं. हालांकि, दूसरी तरफ कुछ इलाकों में पुराने और फल देने वाले बागों को ही निर्माण के लिए इस्तेमाल किए जाने की खबरें सामने आ रही हैं.

बागों की जगह बन रहे घर और कॉम्प्लेक्स

रिपोर्ट के अनुसार किसानों का कहना है कि, कई जगहों पर सेब के पेड़ काटकर घर, दुकान, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, कोल्ड स्टोरेज और दूसरी व्यावसायिक इकाइयां बनाई जा रही हैं. किसान तारिक अहमद का कहना है कि एक बार बाग की जमीन पर पक्का निर्माण हो जाए तो उसे दोबारा खेती के लिए इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल हो जाता है. यानी जिस जमीन से सालों तक फल और किसानों को आमदनी मिल सकती थी, वह धीरे-धीरे दूसरे इस्तेमाल में जा रही है.

श्रीनगर के आसपास ज्यादा बढ़ रहा दबाव

बागवानी की जमीन पर निर्माण का दबाव श्रीनगर और इसके आसपास के इलाकों में ज्यादा देखने को मिल रहा है. शहर के फैलाव के साथ ग्रामीण और बागवानी वाली जमीन पर भी निर्माण गतिविधियां बढ़ रही हैं. एक सैटेलाइट इमेज आधारित रिसर्च के मुताबिक, 1980 से 2012 के बीच श्रीनगर का निर्मित क्षेत्र 3,835 हेक्टेयर बढ़ा. इस दौरान करीब 258 हेक्टेयर प्लांटेशन और बाग की जमीन सीधे निर्मित क्षेत्र में बदल गई. अध्ययन में कुल 689 हेक्टेयर प्लांटेशन और बाग की जमीन के निर्मित क्षेत्र, पार्क, गार्डन और खाली जमीन में बदलने की बात भी सामने आई.

गैर-कृषि जमीन भी बढ़ी

नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में गैर-कृषि उपयोग वाली जमीन 2020-21 से 2023-24 के बीच करीब 1,000 हेक्टेयर बढ़ी है. हालांकि, इस आंकड़े से यह साफ नहीं होता कि इसमें से कितनी जमीन खास तौर पर सेब के बागों से बदली गई है. फिर भी यह आंकड़ा तेजी से बदलते भूमि उपयोग की ओर इशारा करता है.

18 मरला तक जमीन पर अलग अनुमति का नियम

बागवानी विभाग के निदेशक आनंद के अनुसार, 18 मरला तक की बागवानी भूमि को निर्माण के लिए बदलने पर अलग से चेंज ऑफ लैंड यूज यानी CLU की अनुमति की जरूरत नहीं होती. वहीं, 18 मरला से ज्यादा जमीन का इस्तेमाल बदलने के लिए संबंधित डिप्टी कमिश्नर से अनुमति लेनी पड़ती है.

बाग बचाना क्यों जरूरी?

जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था में बागवानी का अहम योगदान है और यह क्षेत्र बड़ी संख्या में लोगों की आय का साधन है. ऐसे में अगर उत्पादक बाग लगातार निर्माण की भेंट चढ़ते रहे तो इसका असर सिर्फ पेड़ों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि किसानों की कमाई, रोजगार और भविष्य के फल उत्पादन पर भी पड़ सकता है. एक तरफ किसान हाई-डेंसिटी तकनीक से कम जमीन में ज्यादा उत्पादन का रास्ता तलाश रहे हैं, तो दूसरी तरफ बागवानी की जमीन को बचाना भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.

Topics: