FMD Vaccination India: देश में पशुपालन करने वाले किसानों के लिए पशुओं का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है. पशुओं में बीमारी फैलने से दूध उत्पादन घटने के साथ-साथ किसानों की कमाई पर भी सीधा असर पड़ता है. इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP) चला रही है. सितंबर 2019 में शुरू हुए इस कार्यक्रम का मकसद मुंहपका-खुरपका रोग (FMD) और ब्रुसेलोसिस जैसी गंभीर बीमारियों को रोकना और धीरे-धीरे खत्म करना है.
कार्यक्रम के तहत बड़े स्तर पर टीकाकरण, पशुओं की निगरानी, बीमारी की जांच और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है. अब तक देशभर में FMD वैक्सीन की 147.16 करोड़ से ज्यादा खुराक दी जा चुकी हैं, जिसका फायदा करीब 8.04 करोड़ किसानों को मिला है.
FMD के मामलों में आई बड़ी कमी
लगातार टीकाकरण का असर अब बीमारी के मामलों पर भी दिखाई दे रहा है. साल 2019 में देश में FMD के 132 प्रकोप सामने आए थे, लेकिन 2025 में इनकी संख्या घटकर सिर्फ 40 रह गई. इसी तरह ब्रुसेलोसिस के मामले भी 2019 के 22 से घटकर 2025 में 15 रह गए हैं. खास बात यह है कि पिछले तीन साल से देश में FMD के Asia-1 सीरोटाइप का कोई प्रकोप सामने नहीं आया है. टीकाकरण के बाद की निगरानी में अलग-अलग सीरोटाइप के खिलाफ पशुओं में अच्छी सुरक्षा भी देखी गई है.
क्या है मुंहपका-खुरपका रोग?
FMD एक बेहद तेजी से फैलने वाली वायरल बीमारी है. यह गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर जैसे खुर वाले पशुओं को प्रभावित करती है. बीमारी होने पर पशुओं का दूध कम हो सकता है और उनका वजन व विकास प्रभावित होता है. कई मामलों में प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है. इसका सीधा नुकसान पशुपालकों को उठाना पड़ता है. इसलिए समय पर टीकाकरण और बीमारी की पहचान बेहद जरूरी है.
ब्रुसेलोसिस से बचाव के लिए एक बार टीका
ब्रुसेलोसिस भी पशुओं के लिए गंभीर बीमारी है और खासतौर पर उनकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है. NADCP के तहत 4 से 8 महीने की उम्र की मादा बछियों को जीवन में एक बार इसका टीका लगाया जाता है. 2025 में टीकाकरण के बाद गाय और भैंस की बछियों में अच्छी एंटीबॉडी प्रतिक्रिया दर्ज की गई.
हर छह महीने FMD वैक्सीन
FMD से बचाव के लिए पात्र पशुओं को हर छह महीने टीका लगाया जाता है. साथ ही पशुओं के कान में ईयर टैग लगाया जाता है और उनकी जानकारी भारत पशुधन पोर्टल पर दर्ज की जाती है. जुलाई 2026 तक 39 करोड़ से ज्यादा पशु इस पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं. हर पशु को 12 अंकों की यूनिक टैग आईडी दी जाती है, जिससे उसके टीकाकरण और बीमारी से जुड़ी जानकारी को ट्रैक करना आसान होता है.
गांवों तक पहुंची मोबाइल पशु चिकित्सा सेवा
पशुपालकों को घर के नजदीक इलाज उपलब्ध कराने के लिए 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 4,019 मोबाइल वेटरनरी यूनिट काम कर रही हैं. इन सेवाओं से अब तक करीब 136 लाख किसानों को फायदा मिला है और 276 लाख पशुओं का इलाज किया गया है. किसान 1962 टोल-फ्री नंबर के जरिए इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं.
बढ़ी पशुओं की उत्पादकता
पशु स्वास्थ्य में सुधार का असर दूध उत्पादन पर भी पड़ा है. देशी और गैर-वर्णित गायों की औसत सालाना दूध उत्पादकता 2014-15 में 927 किलो से बढ़कर 2024-25 में 1,343.2 किलो हो गई. भैंसों की उत्पादकता भी 1,880 किलो से बढ़कर 2,365.2 किलो हो गई. इसी दौरान देश का कुल दूध उत्पादन 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 247.87 मिलियन टन पहुंच गया. सरकार का लक्ष्य 2030 तक औसत दूध उत्पादकता को 3,000 किलो प्रति पशु प्रति वर्ष तक ले जाना है. इसके लिए पशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, प्रशिक्षण और बीमारी की निगरानी पर लगातार जोर दिया जा रहा है.
पशु स्वास्थ्य पर सरकार का बड़ा फोकस
वित्त वर्ष 2026-27 में पशुओं की सेहत और बीमारी पर नियंत्रण से जुड़ी योजना के लिए 2,010 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. इसके अलावा, 39,810 मैत्री तकनीशियनों को प्रशिक्षण दिया गया है. ये तकनीशियन गांवों में पशुपालकों तक पशु स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएं पहुंचाने में मदद कर रहे हैं. सरकार ‘वन हेल्थ’ के तहत पशु, इंसान और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जोड़कर बीमारियों की निगरानी पर भी काम कर रही है. इसके अलावा, 2024 में जी20 महामारी कोष की मदद से 2.5 करोड़ डॉलर की एक परियोजना शुरू की गई थी. इसका मकसद पशुओं में होने वाली बीमारियों की जल्द पहचान करना, प्रयोगशालाओं को मजबूत बनाना और भविष्य में महामारी जैसी स्थिति से निपटने की तैयारी बेहतर करना है.