कश्मीर में साही बना केसर का सबसे बड़ा दुश्मन, 80 प्रतिशत तक फसल बर्बाद… विधानसभा तक पहुंचा मामला

जंगलों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और जानवरों के टूटते घरों के कारण, जम्मू-कश्मीर के संरक्षित जानवर साही अब खेतों की ओर रुख कर चुके हैं. रात में सक्रिय ये जानवर जमीन के नीचे गहरे में जाकर केसर के कंदों को निकालकर खाते हैं. केसर उत्पादन पहले ही बारिश की अनियमितता, सिंचाई की कमी और शहरीकरण से जूझ रहा था.

नई दिल्ली | Published: 6 Apr, 2026 | 10:22 AM

kashmir saffron crisis: कश्मीर की पहचान मानी जाने वाली केसर, जिसे ‘लाल सोना’ कहा जाता है, आज एक बड़े संकट से गुजर रहा है. सदियों से यह फसल घाटी के किसानों की आजीविका का सहारा रही है, लेकिन अब एक अनोखा और खतरनाक दुश्मन इसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है. दक्षिण कश्मीर के पंपोर इलाके में केसर की खेती पर भारतीय धारीदार साहीका हमला बढ़ता जा रहा है. यह जानवर जमीन के नीचे जाकर केसर के कंदों को खा रहा है, जिससे फसल खिलने से पहले ही नष्ट हो रही है. अब किसानों की इस गंभीर समस्या को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी उठाया गया.

पंपोर से दुनिया भर में जाती है केसर

पुलवामा जिले में स्थित पंपोर को कश्मीर का केसर हब कहा जाता है. यह श्रीनगर से करीब 15 किलोमीटर दूर है और यहां की जमीन केसर उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है. यही वजह है कि यहां पैदा होने वाली केसर की मांग देश ही नहीं, विदेशों में भी रहती है.

कैसे साही बना सबसे बड़ा खतरा

अब इस कीमती फसल पर सबसे बड़ा खतरा भारतीय धारीदार साही बन गया है. यह एक निशाचर जीव है, जो रात के समय खेतों में घुसकर जमीन के नीचे मौजूद कंदों को खा जाता है. दरअसल, कंद ही केसर का आधार होता है. जब यही खत्म हो जाता है, तो पौधा उगने से पहले ही खत्म हो जाता है. किसान बताते हैं कि खेतों में फसल दिखने से पहले ही अंदर से खोखली हो रही है, जिससे उत्पादन तेजी से गिर रहा है.

उत्पादन में आई भारी गिरावट

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 15 साल पहले कश्मीर में केसर का उत्पादन लगभग 22,000 किलोग्राम हुआ करता था. लेकिन अब यह घटकर सिर्फ करीब 1,000 किलोग्राम रह गया है.

पंपोर के ही ख्रेव इलाके में, जो पहले करीब 4,000 किलोग्राम उत्पादन देता था, अब वहां की खेती लगभग खत्म हो चुकी है. कई खेत पूरी तरह बंजर जैसे हो गए हैं.

जंगल से खेतों तक साही की घुसपैठ

जंगलों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और जानवरों के टूटते घरों के कारण, जम्मू-कश्मीर के संरक्षित जानवर साही अब खेतों की ओर रुख कर चुके हैं. रात में सक्रिय ये जानवर जमीन के नीचे गहरे में जाकर केसर के कंदों को निकालकर खाते हैं. केसर उत्पादन पहले ही बारिश की अनियमितता, सिंचाई की कमी और शहरीकरण से जूझ रहा था.

वहीं 1997-98 में 15.97 मीट्रिक टन से घटकर 2021-22 में यह सिर्फ 3.48 मीट्रिक टन रह गया. अब साही की वजह से किसानों को सालाना 30% तक की फसल का नुकसान हो रहा है. 2024 तक यह उत्पादन गिरकर 2.6 मीट्रिक टन पर आ गया.

किसानों की हालत खराब, 80  प्रतिशत तक नुकसान

किसानों के लिए यह स्थिति बेहद मुश्किल भरी है. कई किसानों का कहना है कि उनकी फसल का 70 से 80 प्रतिशत तक हिस्सा खराब हो चुका है. किसान रात-रात भर खेतों की निगरानी करते हैं, लेकिन साही जमीन के नीचे से हमला करता है, जिससे उसे रोक पाना आसान नहीं है. इससे उनकी मेहनत और निवेश दोनों बर्बाद हो रहे हैं.

विधानसभा में उठा मामला

इस गंभीर समस्या को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी उठाया गया. नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक हसनैन मसूदी ने इस पर चिंता जताई और कहा कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में केसर की खेती पूरी तरह खत्म हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि साही के कारण खेती बर्बाद हो रही है और सरकार को तुरंत ठोस कार्रवाई करनी चाहिए.

सरकार की प्रतिक्रिया और सुझाव

वन मंत्री जावेद अहमद राणा ने बताया कि विभाग की टीमें पंपोर इलाके में सर्वे कर रही हैं और प्रभावित क्षेत्रों का आकलन किया जा रहा है. सरकार ने किसानों को कुछ उपाय भी सुझाए हैं, जैसे खेतों के आसपास झाड़ियां साफ करना, जालीदार बाड़ लगाना, जैविक दवाओं का इस्तेमाल करना और बिलों के पास निवारक पदार्थ रखना. लेकिन किसान इन उपायों को पर्याप्त नहीं मानते.

क्यों बढ़ रही है साही की संख्या

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या के पीछे पर्यावरण में बदलाव भी जिम्मेदार हैं. जंगलों की कटाई के कारण साही का प्राकृतिक आवास कम हो गया है, जिससे वे खेतों की ओर आ गए हैं. इसके अलावा तेंदुए जैसे शिकारी जानवरों की संख्या कम होने से साही की आबादी तेजी से बढ़ी है. मौसम में बदलाव और गर्म सर्दियों ने भी इनके सक्रिय रहने का समय बढ़ा दिया है.

कानूनी अड़चन भी बड़ी समस्या

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि साही एक संरक्षित जीव है, इसलिए इसे मारना कानूनन गलत है. ऐसे में किसान न तो इसे मार सकते हैं और न ही आसानी से भगा सकते हैं. यही कारण है कि यह समस्या अब मानव-वन्यजीव संघर्ष का रूप ले चुकी है.

क्या खत्म हो जाएगी कश्मीर की पहचान?

पंपोर की धरती, जिसे सदियों से केसर की राजधानी कहा जाता है, अब खतरे में है. अगर इसी तरह फसल जमीन के नीचे से खत्म होती रही, तो आने वाले समय में केसर के फूल ही नहीं खिलेंगे. यह सिर्फ एक फसल का नुकसान नहीं होगा, बल्कि कश्मीर की पहचान और हजारों किसानों की आजीविका पर बड़ा संकट बन जाएगा. अब जरूरत है कि सरकार, वैज्ञानिक और किसान मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें, ताकि ‘लाल सोना’ फिर से अपनी चमक बरकरार रख सके.

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