जलवायु परिवर्तन से खेती पर खतरा, 651 जिलों के अध्ययन में सामने आई बड़ी बात… सरकार ने तैयार की नई योजना

सरकार ने सिर्फ समस्या नहीं बताई, बल्कि उसका हल भी तैयार किया है. हर जिले के लिए जिला कृषि आकस्मिक योजना (DACP) बनाई गई है. इसका मतलब यह है कि अगर अचानक मौसम खराब हो जाए, जैसे बारिश ज्यादा हो जाए या सूखा पड़ जाए तो किसान पहले से जान सकें कि क्या करना है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 25 Mar, 2026 | 03:36 PM

NICRA project India: आजकल मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है. कभी तेज बारिश, कभी सूखा, तो कभी अचानक ओलावृष्टि इन सबका सीधा असर किसानों की मेहनत पर पड़ रहा है. कई बार पूरी फसल बर्बाद हो जाती है. ऐसे हालात को देखते हुए सरकार अब खेती को बदलते मौसम के मुताबिक ढालने पर जोर दे रही है.

इसी दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के जरिए “जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA)” नाम की योजना चलाई जा रही है. इसका मकसद साफ है किसानों को ऐसे तरीके सिखाना, जिससे वे मौसम के बदलते हालात में भी खेती को सुरक्षित रख सकें.

651 जिलों की जांच में सामने आई बड़ी तस्वीर

सरकार ने देश के 651 कृषि प्रधान जिलों में यह देखा कि जलवायु परिवर्तन का असर कहां कितना पड़ रहा है. यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया गया. इसमें पता चला कि 310 जिले ऐसे हैं जहां खेती पर खतरा ज्यादा है. इनमें 109 जिले बहुत ज्यादा जोखिम वाले हैं और 201 जिले उच्च जोखिम वाले हैं. यह आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में खेती अब पहले जैसी आसान नहीं रही.

हर जिले के लिए अलग योजना तैयार

सरकार ने सिर्फ समस्या नहीं बताई, बल्कि उसका हल भी तैयार किया है. हर जिले के लिए जिला कृषि आकस्मिक योजना (DACP) बनाई गई है. इसका मतलब यह है कि अगर अचानक मौसम खराब हो जाए, जैसे बारिश ज्यादा हो जाए या सूखा पड़ जाए तो किसान पहले से जान सकें कि क्या करना है. इसमें फसल बदलने से लेकर नई किस्में अपनाने तक की सलाह दी गई है.

मॉडल गांवों में सिखाई जा रही नई खेती

देश के 151 संवेदनशील जिलों में 448 मॉडल गांव बनाए गए हैं. इन गांवों में किसानों को नई तकनीकों के जरिए खेती करना सिखाया जा रहा है. उन्हें बताया जा रहा है कि कम पानी में कौन-सी फसल बेहतर होगी, कौन-सी किस्म सूखा या बाढ़ झेल सकती है और कैसे कम नुकसान में अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

बीज बैंक और नर्सरी से मिल रही मदद

कई गांवों में बीज बैंक और सामुदायिक नर्सरी शुरू की गई हैं. इससे किसानों को समय पर अच्छे बीज मिल जाते हैं. धान, गेहूं, सोयाबीन और सरसों जैसी फसलों की ऐसी किस्में भी दी जा रही हैं, जो मौसम की मार सहन कर सकती हैं. इससे फसल खराब होने का खतरा कम हो जाता है.

लाखों किसानों को मिला प्रशिक्षण

सरकार किसानों को नई तकनीक सिखाने पर भी जोर दे रही है. देशभर में 731 कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) काम कर रहे हैं. इनके जरिए अब तक 18.56 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है. इसमें उन्हें खेती के नए तरीके, कीट नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने के उपाय बताए जाते हैं.

नई किस्मों से मिलेगी मजबूती

पिछले 10 सालों में 2900 नई फसल किस्में तैयार की गई हैं. इनमें से 2661 किस्में ऐसी हैं जो मौसम और कीटों के असर को झेल सकती हैं. इससे किसानों को कम नुकसान और बेहतर उत्पादन की उम्मीद है.

AI और डिजिटल तकनीक से किसानों को मदद

सरकार अब खेती में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीकों का भी उपयोग कर रही है.

किसान e-मित्र: यह एक वॉइस आधारित AI चैटबॉट है, जो 11 भाषाओं में किसानों के सवालों के जवाब देता है. यह रोज 20,000 से ज्यादा सवालों का समाधान करता है.

भारत विस्तार प्लेटफॉर्म: यह एक डिजिटल मंच है, जहां किसानों को मौसम, बाजार भाव और सरकारी योजनाओं की जानकारी एक ही जगह मिलती है.

राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली: यह AI और मशीन लर्निंग के जरिए कीटों का पहले ही पता लगा लेती है, जिससे फसल नुकसान कम होता है.

किसान सारथी प्लेटफॉर्म: इस पर 2.75 करोड़ से ज्यादा किसान जुड़े हुए हैं और यह उन्हें फसल से जुड़ी सलाह देता है.

इस योजना में छोटे और सीमांत किसानों को खास ध्यान में रखा गया है. गांवों में जलवायु जोखिम प्रबंधन समितियां बनाई जा रही हैं, ताकि किसान मिलकर समस्याओं का समाधान कर सकें.

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