वैज्ञानिकों ने शुरू की जलवायु अनुकूल गेहूं की खेती, सामान्य किस्मों के मुकाबले ज्यादा है आयरन और प्रोटीन
हिमाचल प्रदेश में केवीके धौलाकुआं ने जैव-संवर्धित और जलवायु अनुकूल गेहूं की नई किस्मों की खेती शुरू की है. ICAR करनाल द्वारा विकसित DBW-187, DBW-370, DBW-371 और DBW-327 बेहतर पोषण और स्थिर उत्पादन देती हैं, जिससे किसानों को बदलते मौसम में सुरक्षित और टिकाऊ खेती का विकल्प मिलेगा.
Wheat Farming: इस साल हिमाचल प्रदेश में गेहूं की फसल सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की खाद्य और पोषण सुरक्षा की नींव बन रही है. बदलते मौसम, अनियमित बारिश, तापमान में उतार-चढ़ाव और मिट्टी की गिरती गुणवत्ता ने खेती के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए सिरमौर जिले के धौलाकुआं स्थित राज्य के पहले कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) ने अपने अनुसंधान फार्म में प्राकृतिक तरीके से नई, जैव-संवर्धित (बायोफोर्टिफाइड) और जलवायु अनुकूल गेहूं की किस्मों की खेती शुरू की है. इन किस्मों को आईसीएआर के करनाल स्थित भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान ने विकसित किया है और अब इन्हें धौलाकुआं के शोध फार्म में उगाया जा रहा है, ताकि किसानों को बदलते मौसम के अनुसार बेहतर विकल्प मिल सकें.
केवीके के प्रभारी और मुख्य वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने कहा है कि अब ऐसी फसल किस्मों की जरूरत है जो अच्छी पैदावार के साथ बेहतर पोषण भी दें. उनका कहना है कि ये बायोफोर्टिफाइड और जलवायु के अनुकूल गेहूं की किस्में किसानों के लिए वरदान साबित होंग. उनका लक्ष्य है कि मैदानी इलाकों के अधिक से अधिक किसान इन उन्नत बीजों को अपनाएं और सुरक्षित व टिकाऊ खेती की ओर बढ़ें. उन्होंने कहा कि भविष्य की खेती सिर्फ ज्यादा उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि स्मार्ट और पोषणयुक्त खेती ही आगे का रास्ता दिखाएगी.
गेहूं की इन किस्मों की हो रही खेती
ईटीवी भारत की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि इस साल जिन चार प्रमुख किस्मों के बीज तैयार किए जा रहे हैं, उनमें DBW-187, DBW-370, DBW-371 और DBW-327 शामिल हैं. दावा किया जा रहा है कि ये किस्में बदलते मौसम में भी संतुलित और बेहतर उत्पादन दे सकती हैं. डॉ. मित्तल ने कहा कि ये गेहूं की किस्में सिर्फ ज्यादा पैदावार देने वाली नहीं हैं, बल्कि पोषण से भी भरपूर हैं. इनमें सामान्य गेहूं की तुलना में आयरन, जिंक और प्रोटीन अधिक मात्रा में होता है. इसका मतलब है कि इनका आटा जब रसोई तक पहुंचेगा, तो उससे बनी हर रोटी पेट भरने के साथ शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी देगी.
बदलता मौसम खेती के लिए चुनौती
उन्होंने कहा कि आज खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती बदलता मौसम है. पारंपरिक किस्में अक्सर इन परिस्थितियों में उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं दे पातीं. जलवायु अनुकूल किस्में तापमान में उतार-चढ़ाव सहने, बीमारियों से लड़ने और कम संसाधनों में भी संतुलित उत्पादन देने में सक्षम हैं. इससे किसानों का जोखिम कम होता है और उन्हें स्थिर आय मिलती है. हाल के वर्षों में कभी समय से पहले बारिश हो जाती है, तो कभी लंबा सूखा या असामान्य गर्मी पड़ती है.