Wheat New Variety: कश्मीर के शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर (SKUAST-K) के वैज्ञानिकों ने गेहूं की दो नई किस्में विकसित की हैं, जो किसानों को समय पर फसल काटने में मदद करेंगी और केंद्र शासित प्रदेश में कुल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में सहायक होंगी. दरअसल, कश्मीर में सफल धान-गेहूं फसल चक्र लागू करना पिछले एक दशक से शोध का प्रमुख लक्ष्य रहा है. पहले हरियाणा और दिल्ली जैसे उप-उष्णकटिबंधीय इलाकों से लाई गई गेहूं की किस्में यहां की ठंडी जलवायु में देर से पकती थीं और जून-जुलाई तक खेत में खड़ी रहती थीं. इससे किसानों को धान की रोपाई के लिए समय पर खेत खाली करने में दिक्कत आती थी और फसल चक्र प्रभावित होता था. इसी समस्या को देखते हुए SKUAST-K के वैज्ञानिकों ने ऐसी नई, जल्दी पकने वाली गेहूं किस्में तैयार की हैं, जिन्हें मई के अंत तक काटा जा सकता है, जिससे धान-गेहूं प्रणाली को मजबूत करने में मदद मिलेगी.
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब एक दशक तक लगातार शोध और परीक्षण के बाद शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर (SKUAST-K) के वैज्ञानिकों ने गेहूं की दो नई किस्में विकसित की हैं, जिनका नाम Shalimar Wheat-4 (SW-4) और Shalimar Wheat-3 (SW-3) रखा गया है. इनमें SW-4 मई के आखिरी सप्ताह तक पक जाती है, जबकि SW-3 जून के पहले सप्ताह में तैयार हो जाती है. दोनों किस्मों को खास तौर पर धान-गेहूं फसल चक्र के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि किसान समय पर खेत खाली कर सकें.
नई किस्मों की क्या है खासियत
नई किस्मों में पहले की तरह अच्छी कृषि विशेषताएं और ठंड सहने की क्षमता है, लेकिन इनकी सबसे बड़ी खासियत है जल्दी पकना है. आम तौर पर जल्दी पकने वाली फसलों में उत्पादन थोड़ा कम होने का खतरा रहता है, क्योंकि पकने की अवधि और उपज के बीच अक्सर उल्टा संबंध होता है. फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि फसल चक्र के लिए समय पर तैयार होना ज्यादा जरूरी है.
क्रॉस-ब्रीडिंग और चयन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया गया
शोधकर्ताओं के मुताबिक, ये दोनों किस्में अच्छी उपज देने में भी सक्षम हैं, लेकिन इनकी असली ताकत यह है कि ये धान-गेहूं प्रणाली में आसानी से फिट हो जाती हैं. इन किस्मों को पारंपरिक प्रजनन तकनीकों, जैसे क्रॉस-ब्रीडिंग और चयन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया गया. वैज्ञानिकों ने सैकड़ों क्रॉस से हजारों पौधों की संततियां तैयार कीं और लंबी जांच के बाद जल्दी पकने वाली उपयुक्त किस्मों का चयन किया.
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर (SKUAST-K) में जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर शबीर हुसैन वानी, जिन्होंने SW-3 किस्म विकसित की, ने बताया कि इस गेहूं को तैयार करने की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की गई. सबसे पहले कई वर्षों तक लैब और रिसर्च फार्म में बेहतर पौधों का चयन किया गया, जिसे ‘पेडिग्री सिलेक्शन’ कहा जाता है. इसके बाद -3 साल तक विश्वविद्यालय के अलग-अलग शोध केंद्रों पर इसे विभिन्न मौसम और पर्यावरणीय परिस्थितियों में परखा गया. फिर करीब दो साल तक कृषि विभाग की मदद से किसानों के खेतों में इसका परीक्षण किया गया. पूरी प्रक्रिया को पूरा करने में लगभग 9 से 10 साल लगे.
1,850 मीटर तक की ऊंचाई पर कर सकते हैं खेती
नई किस्मों की एक अहम विशेषता पीली रतुआ (येलो रस्ट) रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है. यह फफूंदजनित बीमारी पत्तियों को जंग जैसा पीला बना देती है, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उपज घटती है. कश्मीर की जलवायु में यह समस्या अक्सर देखी जाती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि रोग-प्रतिरोधक क्षमता किसानों के जोखिम को कम करती है, खासकर उन वर्षों में जब बीमारी फैलने की संभावना ज्यादा होती है. ये नई किस्में समुद्र तल से लगभग 1,850 मीटर तक की मध्य ऊंचाई वाले इलाकों के लिए उपयुक्त हैं. आधिकारिक मंजूरी मिलने के बाद अब बीज उत्पादन और किसानों तक वितरण का काम शुरू किया जा रहा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि गुरेज जैसे क्षेत्रों में, जहां गेहूं अक्सर चारे के लिए उगाया जाता है, वहां भी यह किस्म अनाज के रूप में अतिरिक्त लाभ देगी.
SW-3 में आयरन और जिंक की मात्रा 40 पीपीएम से अधिक
डॉ. वानी के अनुसार, SW-3 में आयरन और जिंक की मात्रा 40 पीपीएम से अधिक है, प्रोटीन लगभग 12 प्रतिशत है, यह रोग-प्रतिरोधी है और इसकी संभावित उपज 38 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है. अक्टूबर 2025 में विश्वविद्यालय ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास गुरेज घाटी में किसानों को SW-3 बीज उपलब्ध कराए. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 70 क्विंटल बीज और वैज्ञानिक खेती पैकेज के साथ 700 किसानों को वितरित किए गए, जिससे घाटी के 70 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर किया गया. इस अभियान का उद्देश्य दूर-दराज के गांवों तक आधुनिक कृषि तकनीक पहुंचाना है, जहां किसान अब भी पारंपरिक बीज प्रणाली पर निर्भर हैं और वैज्ञानिक नवाचारों तक उनकी पहुंच सीमित है.