Paddy Cultivation: हरियाणा के यमुनानगर जिले में खरीफ सीजन 2026 के दौरान 2.12 लाख एकड़ क्षेत्र में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया है. तेज गर्मी और हीटवेव को देखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग किसानों को डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है. जिले में 25 मई से डीएसआर की बुवाई भी शुरू हो चुकी है. कृषि विभाग के अनुसार डीएसआर तकनीक से धान की खेती करने पर कई फायदे मिलते हैं. इससे करीब 30 फीसदी भूजल की बचत होती है और बिजली की खपत भी कम होती है. मजदूरों की जरूरत और लागत घटने से किसानों का खर्च लगभग 10 हजार रुपये प्रति एकड़ तक कम हो सकता है. यानी किसानों को 10 हजार रुपये का फायदा होगा.
इस तकनीक से समय पर बुवाई और फसल की अच्छी बढ़वार होती है. खेत तैयार करने में कम मेहनत लगती है और पानी की कमी के समय सिंचाई का बेहतर उपयोग किया जा सकता है. इसके अलावा डीएसआर तकनीक से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर रहती है, मीथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है और पर्यावरण को भी फायदा मिलता है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि डायरेक्ट बुवाई तकनीक मिट्टी की सेहत सुधारने और फसल उत्पादन बढ़ाने में मददगार है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पारंपरिक खेती में ट्रैक्टर से बार-बार जुताई करने से मिट्टी में सख्त परत बन जाती है. इससे मिट्टी के छोटे छिद्र बंद हो जाते हैं और जमीन की पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है, जिसका असर धीरे-धीरे मिट्टी की उर्वरता पर पड़ता है.
मिट्टी की प्राकृतिक बनावट
इसके मुकाबले डायरेक्ट बुवाई से मिट्टी की प्राकृतिक बनावट बनी रहती है और नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है. इससे जमीन मजबूत होती है और अगली फसल, खासकर गेहूं और दूसरी प्रमुख फसलों का उत्पादन बेहतर होने की संभावना बढ़ जाती है. डायरेक्ट धान बुवाई तकनीक अपनाने से किसानों की खेती लागत में बड़ी कमी देखने को मिल रही है. जून-जुलाई में धान रोपाई के समय किसानों को उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे रोपाई का खर्च करीब 5 से 6 हजार रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच जाता है.
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कैसे की जाती है धान की सीधी बुवाई
लेकिन डायरेक्ट बुवाई तकनीक में ट्रैक्टर और मशीनों की मदद से बीज सीधे खेत में बो दिए जाते हैं. इससे हाथों से रोपाई की जरूरत खत्म हो जाती है और मजदूरी खर्च काफी कम हो जाता है. साथ ही खेत तैयार करने और पानी भरने की प्रक्रिया कम होने से डीजल की खपत भी घटती है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक किसानों की लागत घटाने के साथ खेती को ज्यादा आसान और प्रभावी बना सकती है. यमुनानगर जिले में कई प्रगतिशील किसान डीएसआर तकनीक से खेती कर दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन रहे हैं. इस तकनीक से उन्हें अच्छी आमदनी होने के साथ पानी बचाने और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है.
52.83 लाख रुपये की सब्सिडी भेजी गई
यमुनानगर जिले में पिछले कुछ वर्षों में किसानों का डीएसआर तकनीक की ओर रुझान तेजी से बढ़ा है. कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में 1320.96 एकड़ क्षेत्र में डीएसआर विधि से धान की खेती की गई थी. इसके लिए किसानों के खातों में डीबीटी के जरिए 52.83 लाख रुपये की सब्सिडी भेजी गई. वहीं, वर्ष 2025 में 2755.85 एकड़ क्षेत्र में डीएसआर खेती का सत्यापन हुआ और किसानों को 1.24 करोड़ रुपये से ज्यादा की सब्सिडी सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर की गई. अब कृषि विभाग ने खरीफ सीजन 2026 के लिए यमुनानगर जिले में 35 हजार एकड़ क्षेत्र में डीएसआर तकनीक से खेती का लक्ष्य तय किया है.