पंजाब में धान बुवाई का टूटा रिकॉर्ड, 32 लाख हेक्टेयर के पार रकबा.. फसल विविधीकरण का असर नहीं
पंजाब में धान की खेती का रकबा इस खरीफ सीजन में रिकॉर्ड 32.76 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है. राज्य के 90 फीसदी से ज्यादा खरीफ क्षेत्र में धान की खेती हो रही है. बासमती का रकबा बढ़ा है, लेकिन कपास, मक्का और गन्ने जैसी वैकल्पिक फसलों का क्षेत्र सीमित है. ऐसे में धान पर निर्भरता कम करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.
पंजाब में धान की खेती का रकबा इस खरीफ सीजन में अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 32.76 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है. पंजाब कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, धान के रकबे में बढ़ोतरी में बासमती और गैर-बासमती दोनों किस्मों का योगदान रहा है. खास बात यह है कि धान का रकबा बढ़ने की यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब सरकार पिछले कई वर्षों से पंजाब में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है. इसका मकसद धान पर निर्भरता कम करना और लगातार गिरते भूजल स्तर पर दबाव घटाना है.
पंजाब में खरीफ सीजन के दौरान करीब 36 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है. बासमती और गैर-बासमती धान को मिलाकर राज्य के 90 फीसदी से ज्यादा खरीफ क्षेत्र में अब धान की खेती हो रही है. आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में पंजाब में 31.79 लाख हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी. 2024-25 में यह बढ़कर 32.43 लाख हेक्टेयर हो गई. वहीं, चालू खरीफ सीजन में धान का रकबा बढ़कर 32.76 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है, जो राज्य के रिकॉर्ड में अब तक सबसे अधिक है.
25.90 लाख हेक्टेयर में गैर-बासमती की बुवाई
पंजाब में धान का रकबा बढ़ने में बासमती और गैर-बासमती दोनों किस्मों का योगदान रहा है. गैर-बासमती धान का रकबा 2023-24 में 25.83 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में मामूली घटकर 25.63 लाख हेक्टेयर रह गया. हालांकि, इस साल यह फिर बढ़कर 25.90 लाख हेक्टेयर हो गया है. वहीं, बासमती धान का रकबा लगातार बढ़ा है. 2023-24 में यह 6.39 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में बढ़कर 6.80 लाख हेक्टेयर और इस खरीफ सीजन में 6.86 लाख हेक्टेयर पहुंच गया.
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पंजाब में कुल धान के रकबे में कोई कमी नहीं
पंजाब में बासमती धान का रकबा बढ़ना किसानों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. इसकी वजह यह है कि बासमती किसानों को सरकार की ओर से खरीदे जाने वाले पारंपरिक धान के मुकाबले एक दूसरा विकल्प देता है. साथ ही, बासमती की फसल अवधि कुछ गैर-बासमती किस्मों की तुलना में कम होती है, जिससे पानी की खपत भी कम हो सकती है. हालांकि, पंजाब में कुल धान के रकबे में कोई कमी नहीं आई है. बासमती की खेती बढ़ने के बावजूद राज्य में धान का कुल क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है. यही वजह है कि राज्य के फसल विविधीकरण कार्यक्रम के सामने चुनौती बनी हुई है.
वैकल्पिक फसलों का रकबा 3 लाख हेक्टेयर के आसपास सिमटा
पंजाब में धान पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है. इसके तहत कपास, मक्का और गन्ने जैसी खरीफ फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है. हालांकि, इन तीनों फसलों का कुल रकबा ज्यादातर वर्षों में 4 लाख हेक्टेयर से ऊपर नहीं पहुंच पाया है. हाल के वर्षों में तो इनका संयुक्त रकबा घटकर करीब 3 लाख हेक्टेयर रह गया है. इससे साफ है कि बासमती का रकबा बढ़ने के बावजूद पंजाब में धान का दबदबा कम करना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.
पंजाब में धान पर निर्भरता कम करने के लिए जिन फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उनमें कपास, मक्का और गन्ना प्रमुख हैं. हालांकि, इन फसलों का रकबा बढ़ने के बजाय घटा या स्थिर रहा है. मालवा क्षेत्र की कभी प्रमुख फसल रही कपास का रकबा 2015 में 3.35 लाख हेक्टेयर था, जो इस साल घटकर करीब 80 हजार हेक्टेयर रह गया है. यानी इसमें 76 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है. इसी तरह, धान के विकल्प के तौर पर मक्का को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन इसका रकबा भी नहीं बढ़ पाया. 2015-16 में मक्का 1.26 लाख हेक्टेयर में बोया गया था, जबकि हाल के वर्षों में इसका क्षेत्र घटकर एक लाख हेक्टेयर से भी कम रह गया है.