Kashmir agriculture news: कश्मीर घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और उपजाऊ कृषि भूमि के लिए देशभर में जानी जाती है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां एक ऐसी समस्या तेजी से बढ़ रही है, जिसने किसानों, कृषि विशेषज्ञों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. घाटी में खेती योग्य जमीन लगातार कम होती जा रही है. खेतों की जगह अब मकान, कॉलोनियां, होटल और व्यावसायिक इमारतें बन रही हैं. इसका असर न केवल कृषि उत्पादन पर पड़ रहा है, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में कश्मीर को अपनी खाद्यान्न जरूरतों के लिए दूसरे राज्यों पर और अधिक निर्भर होना पड़ सकता है.
तीन दशक में हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि हुई खत्म
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1996 से 2023 के बीच कश्मीर में लगभग 34 हजार हेक्टेयर खेती योग्य भूमि कम हो गई है. यह जमीन कभी धान, मक्का और अन्य फसलों के उत्पादन के लिए इस्तेमाल होती थी, लेकिन अब इसका बड़ा हिस्सा गैर-कृषि गतिविधियों में बदल चुका है.
तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण और निर्माण कार्यों ने कृषि भूमि पर दबाव बढ़ा दिया है. कई गांवों के आसपास खेतों की जगह अब नई कॉलोनियां और व्यापारिक परिसर दिखाई देने लगे हैं. इससे खेती का क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है.
खाद्यान्न उत्पादन जरूरत से काफी कम
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार कश्मीर की खाद्यान्न जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन स्थानीय उत्पादन उस स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है. वर्तमान में घाटी में हर साल करीब 4.5 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है, जबकि कुल जरूरत लगभग 13.4 लाख टन है. यानी घाटी अपनी जरूरत का केवल एक हिस्सा ही खुद पैदा कर पा रही है. बाकी खाद्यान्न दूसरे राज्यों से मंगाना पड़ता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कृषि भूमि और कम होती रही तो यह अंतर और बढ़ सकता है.
धीरे-धीरे गायब हो रही है धान रोपाई की परंपरा
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, कश्मीर की ग्रामीण संस्कृति में धान की खेती का विशेष महत्व रहा है. हर साल मई के अंत से जून तक धान की रोपाई का मौसम शुरू होता है, जिसे स्थानीय भाषा में “थेजकाड़” कहा जाता है. एक समय था जब यह केवल खेती का काम नहीं बल्कि एक सामाजिक उत्सव जैसा होता था. गांवों में महिलाएं और पुरुष मिलकर खेतों में धान की पौध लगाते थे. लोकगीत गूंजते थे और पूरा माहौल उत्साह से भरा रहता था.
लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. पुलवामा के किसान मुश्ताक अहमद बताते हैं कि पहले गांवों में हर तरफ धान की रोपाई दिखाई देती थी, लेकिन अब ऐसे दृश्य बहुत कम नजर आते हैं. खेतों की संख्या कम होने के साथ यह सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ रही है.
सेब के बागानों की ओर बढ़ रहा रुझान
कश्मीर में कई किसान पारंपरिक धान खेती छोड़कर सेब के बागानों की ओर रुख कर रहे हैं. सेब की खेती से अपेक्षाकृत अधिक आय मिलने के कारण किसान इसे बेहतर विकल्प मान रहे हैं. हालांकि इससे किसानों की आय बढ़ सकती है, लेकिन खाद्यान्न उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ रहा है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बागवानी और खाद्यान्न उत्पादन के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि भविष्य में खाद्य संकट जैसी स्थिति पैदा न हो.
कानून होने के बावजूद जारी है कृषि भूमि का रूपांतरण
जम्मू-कश्मीर में कृषि भूमि को गैर-कृषि कार्यों में बदलने पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं. जम्मू-कश्मीर भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 133 के तहत बिना सरकारी अनुमति के कृषि भूमि का अन्य उपयोग नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद घाटी के कई इलाकों में नियमों का उल्लंघन होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं. खेतों को आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं में बदला जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र लगातार सिमट रहा है.
भविष्य के लिए खतरे की घंटी
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि भूमि का संरक्षण केवल किसानों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की जरूरत है. खेती योग्य जमीन कम होने का मतलब है स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट और बाहरी राज्यों पर बढ़ती निर्भरता. यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो कश्मीर को भविष्य में खाद्य सुरक्षा, कृषि रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए कृषि भूमि बचाने, किसानों को प्रोत्साहित करने और खेती को लाभकारी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है.