Soybean Cultivation Rise: भारत में इस साल सोयाबीन की खेती का रकबा बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. इसका मुख्य कारण सोयाबीन के दामों में हालिया तेज बढ़ोतरी और मानसून में कमजोर बारिश का अनुमान है. विशेषज्ञों का मानना है कि कई किसान अब ज्यादा पानी वाली फसलों जैसे गन्ना और मक्का से हटकर सोयाबीन की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि यह कम पानी में भी अच्छी उपज देने वाली फसल है.
बेहतर दामों ने बढ़ाई सोयाबीन की मांग
सोयाबीन के दाम पिछले कुछ समय में चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं. बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, सोयाबीन की बाजार में कीमत लगभग 7,587 रुपये प्रति 100 किलोग्राम तक पहुंच गई है, जो सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी अधिक है. इसके मुकाबले मक्का की कीमतें कम हैं, जिससे किसानों को सोयाबीन ज्यादा लाभदायक विकल्प लग रहा है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी फसल में बेहतर रिटर्न मिलता है, तो किसान स्वाभाविक रूप से उसी की ओर रुख करते हैं. यही वजह है कि इस बार सोयाबीन की बुवाई क्षेत्र में बढ़ोतरी की उम्मीद है.
कम बारिश का अनुमान बना बड़ा कारण
इस साल मानसून को लेकर भी चिंता जताई जा रही है. मौसम विशेषज्ञों के अनुसार अल-नीनो प्रभाव के कारण बारिश सामान्य से कम रह सकती है. ऐसे में किसान उन फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है. सोयाबीन ऐसी ही एक फसल है, जो मक्का और गन्ने की तुलना में कम पानी में भी अच्छी तरह उग सकती है. इसी कारण महाराष्ट्र और मध्य भारत के किसान इसे अधिक महत्व दे रहे हैं.
गन्ना और मक्का से सोयाबीन की ओर बदलाव
पिछले साल कई किसानों ने मक्का की खेती की थी, लेकिन कम लाभ के कारण अब वे दोबारा सोयाबीन की ओर लौट रहे हैं. वहीं, गन्ना जैसी पानी-आधारित फसलों की जगह भी किसान सोयाबीन को चुन रहे हैं. महाराष्ट्र के सोलापुर जैसे क्षेत्रों में किसान अब बदलते मौसम और कम बारिश की संभावना को देखते हुए सोयाबीन की खेती को सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं.
कृषि क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत
इस साल सोयाबीन का क्षेत्रफल लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. पिछले वर्ष लगभग 12 मिलियन हेक्टेयर में सोयाबीन की खेती हुई थी, और इस बार इसमें बढ़ोतरी की उम्मीद है. यदि उत्पादन बढ़ता है, तो इसका असर देश के खाद्य तेल बाजार पर भी पड़ेगा. भारत दुनिया में खाद्य तेल का सबसे बड़ा आयातक है, और बढ़ा हुआ उत्पादन आयात पर निर्भरता को कम कर सकता है.
तेल और पशु आहार उद्योग को फायदा
सोयाबीन से सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि सोयामील भी तैयार होता है, जो पोल्ट्री उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. अगर उत्पादन बढ़ता है तो सोयामील की कीमतें स्थिर हो सकती हैं, जिससे पोल्ट्री व्यवसाय को राहत मिलेगी. इसके अलावा, देश में आयातित पाम ऑयल, सोया ऑयल और सूरजमुखी तेल की मांग भी कुछ हद तक कम हो सकती है. हालांकि सोयाबीन की बुवाई बढ़ने की संभावना है, लेकिन इसकी पैदावार पूरी तरह मानसून पर निर्भर करेगी. अगर बारिश अनुकूल रही तो उत्पादन में अच्छा इजाफा हो सकता है, लेकिन कमजोर मानसून से उपज प्रभावित भी हो सकती है.