Mango Farming Tips: उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला दुनियाभर में अपनी आम की खेती के लिए जाना जाता है. यहां किसान सैकड़ों किस्मों के आम उगाते हैं, लेकिन जैसे ही पेड़ों पर बौर से फल बनने लगते हैं, वैसे ही कीटों का हमला शुरू हो जाता है. NHRDF के संयुक्त निदेशक डॉ. रजनीश मिश्रा के अनुसार, यह समय किसानों के लिए बेहद संवेदनशील होता है, क्योंकि जरा सी लापरवाही पूरी फसल को प्रभावित कर सकती है.
सबसे खतरनाक दुश्मन: हॉपर कीट
आम की फसल के लिए सबसे बड़ा खतरा ‘हॉपर कीट’ (भुनगा) माना जाता है. अप्रैल का महीना इसके पनपने के लिए सबसे अनुकूल होता है. इसी दौरान यह तेजी से फैलता है और बौर से बन रहे छोटे फलों को नुकसान पहुंचाता है. अगर समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कीट उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है. हॉपर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह खुले में कम और छिपकर ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. यह पेड़ों के तनों, बाग की ऊंची घास और आसपास के जंगली पौधों में छिपा रहता है.
किसान अक्सर सिर्फ पेड़ों पर दवा का छिड़काव करते हैं, लेकिन जमीन की सफाई को नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बाद में भारी पड़ती है, क्योंकि यही छिपे हुए कीट तेजी से बढ़कर फसल पर हमला करते हैं.
सिर्फ दवा से नहीं होगा पूरा नियंत्रण
डॉ. रजनीश मिश्रा के अनुसार, केवल रासायनिक कीटनाशकों के भरोसे इस कीट को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है. समय के साथ यह कीट दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है, जिससे उनका असर कम हो जाता है. इसलिए किसानों को वैकल्पिक और टिकाऊ उपाय अपनाने की जरूरत है.
आसान और सस्ते उपाय से पाएं छुटकारा
किसान बिना महंगे और जहरीले रसायनों के भी इस कीट पर काबू पा सकते हैं. आप कुछ आसान उपयों की मदद से इससे छुटकारा पा सकते हैं. इनमें:
- लाइट ट्रैप का इस्तेमाल: यह कीट रोशनी की ओर आकर्षित होता है, इसलिए लाइट ट्रैप लगाकर इसे आसानी से फंसाया जा सकता है.
- येलो स्टिकी ट्रैप: पीले रंग के चिपचिपे पैड पर कीट चिपककर खत्म हो जाते हैं, जो एक प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल तरीका है.
साफ-सफाई है सबसे बड़ा हथियार
बाग की नियमित सफाई बेहद जरूरी है. छिड़काव के साथ-साथ खेत और बाग के आसपास की बड़ी घास को हटाना चाहिए, क्योंकि यही हॉपर कीट का मुख्य ठिकाना होता है. यदि किसान समय पर सफाई और ट्रैप तकनीक अपनाते हैं, तो कीटों का प्रकोप काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इन आसान उपायों को अपनाकर न सिर्फ आम की फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है, बल्कि उत्पादन और गुणवत्ता भी बेहतर होती है. साथ ही रासायनिक दवाओं पर खर्च कम होता है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है.