मध्य प्रदेश की मुर्रा भैंस योजना से किसानों को 75 फीसदी सब्सिडी, बढ़ेगी दूध से कमाई और रोजगार

मध्य प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना के तहत मुर्रा भैंस पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस योजना में किसानों को 50 फीसदी से 75 फीसदी तक सब्सिडी दी जा रही है. इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन बढ़ाना और किसानों की आय को मजबूत बनाना है, जिससे रोजगार के नए अवसर बन सकें.

नोएडा | Published: 28 May, 2026 | 12:16 PM

Murrah buffalo scheme: मध्य प्रदेश सरकार ने पशुपालन और डेयरी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए एक अहम कदम उठाया है. राज्य में मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना के जरिए किसानों और पशुपालकों को मुर्रा नस्ल की भैंसें पालने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए अवसर पैदा करना और किसानों की आय में स्थायी बढ़ोतरी करना है. मुर्रा भैंस को देश की सबसे अधिक दूध देने वाली नस्लों में माना जाता है, जो किसानों के लिए लगातार आमदनी का मजबूत साधन बन सकती है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बड़ी पहल

सरकार की यह योजना खासतौर पर उन किसानों और बेरोजगार ग्रामीण युवाओं  के लिए बनाई गई है, जो खेती के साथ-साथ अतिरिक्त आय के स्रोत की तलाश में हैं. मुर्रा भैंस प्रतिदिन औसतन 10 से 15 लीटर दूध देने में सक्षम होती है, जिससे नियमित आय का एक स्थायी जरिया बनता है. इसके दूध की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है, साथ ही डेयरी उत्पाद जैसे दही, घी और पनीर की मांग भी लगातार बनी रहती है. इस योजना के जरिए सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में डेयरी व्यवसाय को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भरता की दिशा में काम कर रही है.

दो भैंसों की यूनिट और भारी सरकारी सहायता

इस योजना के तहत लाभार्थियों को दो मुर्रा भैंसों  की एक यूनिट प्रदान की जाती है. सबसे खास बात यह है कि इसमें सरकार की ओर से भारी सब्सिडी दी जा रही है. सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को लगभग 50 प्रतिशत तक की सहायता मिलती है, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को 75 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाता है.

भैंस खरीदने  के लिए लाभार्थियों को तय राज्य में भेजा जाता है, जहां चयनित पशु उपलब्ध कराए जाते हैं. सरकार यात्रा, ठहरने और पशुओं के परिवहन का पूरा खर्च भी वहन करती है, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ काफी कम हो जाता है. सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को लगभग 1.47 लाख रुपये तक का अंशदान करना होता है, जबकि आरक्षित वर्ग के लिए यह राशि लगभग 73 हजार रुपये तक सीमित रहती है.

आवेदन प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेज

इस योजना का लाभ लेने के लिए आवेदक की उम्र 18 से 60 वर्ष के बीच होनी चाहिए. साथ ही उसके पास पशुओं को रखने के लिए उचित स्थान, चारा और देखभाल की सुविधा होना आवश्यक है. आवेदन करने के लिए आधार कार्ड, बैंक पासबुक, निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और पासपोर्ट साइज फोटो जैसे दस्तावेज जरूरी हैं.

आवेदन प्रक्रिया ऑफलाइन माध्यम से की जा सकती है. इच्छुक लाभार्थी नजदीकी पशु चिकित्सालय या संबंधित सरकारी कार्यालय से फॉर्म प्राप्त कर सकते हैं. फॉर्म भरकर दस्तावेजों के साथ जमा करना होता है, जिसके बाद पंचायत और जिला स्तर पर जांच की जाती है.

चयन प्रक्रिया और ग्रामीण विकास पर असर

योजना के तहत लाभार्थियों का चयन पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर किया जा रहा है, क्योंकि यह एक सीमित बजट वाली योजना है. आवेदन की जांच के बाद पात्र लोगों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन भी दिया जाता है, ताकि वे डेयरी व्यवसाय  को सफलतापूर्वक चला सकें. विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगी. इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि राज्य की डेयरी अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.

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