विलुप्त होने की कगार पर पहुंची ‘पेरियार’ गाय को मिली पहचान, ICAR ने दी देसी नस्ल की मान्यता

केरल की दुर्लभ पेरियार गाय, जो कभी विलुप्त होने की कगार पर थी, अब देश की नई स्वदेशी नस्ल बन गई है. आठ साल के संरक्षण अभियान के बाद ICAR ने इसे मान्यता दी. इसका औषधीय गुणों वाला दूध 100-120 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है.

नोएडा | Published: 22 Aug, 2026 | 11:51 AM

Indigenous Cow Breed: कभी जंगलों में गुम होती एक छोटी सी गाय, आज पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना चुकी है. केरल की दुर्लभ पेरियार नस्ल को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR) ने राज्य की नई स्वदेशी मवेशी नस्ल के रूप में आधिकारिक मान्यता दे दी है. आठ साल तक चले संरक्षण अभियान के बाद मिली यह मंजूरी किसानों और पशुपालन क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.

8 साल की मेहनत के बाद मिली बड़ी सफलता

पेरियार नस्ल  को स्थानीय भाषा में ‘पेरियार कुल्लन’ यानी बौनी पेरियार गाय कहा जाता है. यह मुख्य रूप से केरल के इडुक्की और एर्नाकुलम जिलों में पेरियार नदी के किनारे वन क्षेत्रों के आसपास पाई जाती है. आईसीएआर-एनबीएजीआर ने 8 अगस्त को हुई नस्ल पंजीकरण समिति की बैठक में इसे नई स्वदेशी नस्ल के रूप में मंजूरी दी. इसके बाद 18 अगस्त को पशुपालन विभाग को आधिकारिक पत्र भेजकर इस फैसले की जानकारी दी गई. किसानों का कहना है कि यह मान्यता वर्षों की मेहनत और संरक्षण अभियान का नतीजा है.

औषधीय गुणों वाला दूध, मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कोडानद गांव के किसान कोसे कुरियन ने 2017 में इस नस्ल के संरक्षण की शुरुआत की थी. उन्होंने बताया कि पेरियार गाय  आकार में छोटी होती है, लेकिन इसका दूध बेहद पौष्टिक और औषधीय गुणों वाला माना जाता है. यह गाय रोजाना औसतन 2 से 3 लीटर दूध देती है, लेकिन स्थानीय बाजार में इसका दूध 100 से 120 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है. जंगल के पास प्राकृतिक वातावरण में चरने के कारण इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काफी मजबूत मानी जाती है और इसे दूसरी नस्लों की तरह महंगी पशुशाला की जरूरत नहीं पड़ती.

80 गायों से शुरू हुआ अभियान, अब 2,500 तक पहुंचा आंकड़ा

कुरियन ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने कुछ गायों के साथ संरक्षण अभियान शुरू किया था. बाद में कई किसान इस प्रयास से जुड़े और एक सामुदायिक समूह बन गया. आज इस क्षेत्र में करीब 2,500 पेरियार नस्ल के मवेशी मौजूद हैं. 2018 से केरल पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय पशु  आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने मिलकर इस नस्ल पर वैज्ञानिक अध्ययन किया. शोध के बाद इसकी विशेषताओं को प्रमाणित किया गया और आखिरकार इसे आधिकारिक पहचान मिल गई.

मान्यता से बढ़ेगा संरक्षण और किसानों को मिलेगा सहारा

स्वदेशी नस्ल का दर्जा मिलने के बाद अब इस गाय पर और अधिक वैज्ञानिक शोध  किए जा सकेंगे. केरल जैव विविधता बोर्ड ने संरक्षण के लिए इस नस्ल के सांडों से वीर्य संग्रह का काम भी शुरू किया है, ताकि भविष्य में इसकी संख्या बढ़ाई जा सके. किसानों का मानना है कि अब सरकार से बेहतर सहायता, प्रजनन कार्यक्रम और संरक्षण योजनाएं मिलने की संभावना बढ़ेगी. इससे अधिक किसान पेरियार नस्ल का पालन शुरू करेंगे और केरल की यह दुर्लभ गाय एक बार फिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत पहचान बन सकेगी.

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