Karan Fries cow: भारत में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र के लिए यह समय बेहद खास बन गया है. देश में पहली बार ऐसी उपलब्धि सामने आई है, जिसने न सिर्फ वैज्ञानिकों बल्कि किसानों को भी नई उम्मीद दी है. करनाल स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में विकसित करन फ्रीज गाय ने एक ही दिन में 46.5 किलो दूध देकर नया रिकॉर्ड बना दिया है. इसी के साथ करन फ्रीज समेत देश की 16 पशु नस्लों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी मिल गई है. यह कदम पशु नस्लों के संरक्षण, उनकी पहचान और किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
पशु नस्लों को क्यों मिली राष्ट्रीय मान्यता
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत काम करने वाले राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने हाल ही में 16 नई पशु नस्लों को आधिकारिक रूप से पंजीकृत किया है. इनमें 13 देशी नस्लें और तीन विकसित या कृत्रिम नस्लें शामिल हैं. इस नई मान्यता के साथ अब देश में पंजीकृत पशु नस्लों की कुल संख्या बढ़कर 246 हो गई है. इनमें ज्यादातर देशी नस्लें हैं, जबकि कुछ वैज्ञानिक तरीकों से विकसित की गई नस्लें भी शामिल हैं. इसका मकसद केवल पहचान देना नहीं, बल्कि इन नस्लों को संरक्षित करना और उन्हें पशुगणना जैसी सरकारी योजनाओं में शामिल करना भी है.
करन फ्रीज गाय क्यों है खास
द ट्रिब्यून की खबर के अनुसार, करन फ्रीज गाय को भारत की डेयरी क्रांति की अगली कड़ी कहा जा सकता है. इसे खासतौर पर ज्यादा दूध देने और भारतीय मौसम के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है. वैज्ञानिकों ने इसमें विदेशी होल्सटीन फ्रीजियन नस्ल और देशी थारपारकर गाय के गुणों का संतुलन तैयार किया. इसका नतीजा यह हुआ कि करन फ्रीज न केवल ज्यादा दूध देती है, बल्कि गर्म और आर्द्र मौसम में भी आसानी से खुद को ढाल लेती है. इसकी बनावट, काला-सफेद रंग और बिना कूबड़ वाला शरीर इसे बाकी नस्लों से अलग बनाता है.
दूध उत्पादन में दोगुनी क्षमता
करन फ्रीज गाय की सबसे बड़ी ताकत उसका दूध उत्पादन है. सामान्य तौर पर यह एक दुग्धावधि में औसतन 3,550 किलो दूध देती है, जो देश की कई देशी नस्लों की क्षमता से लगभग दोगुनी है. कुछ विशेष गायों ने 305 दिनों में 5,851 किलो तक दूध दिया है. सबसे बड़ी बात यह है कि एक दिन में 46.5 किलो दूध देने का आंकड़ा भारतीय परिस्थितियों में हासिल किया गया है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है.
वैज्ञानिक मेहनत और किसानों की भागीदारी
करन फ्रीज के विकास के पीछे चार दशक से भी ज्यादा समय की वैज्ञानिक मेहनत छिपी है. लगातार निगरानी, चयन और सुधार के जरिए इसके गुणों को स्थिर किया गया. शुरुआत में आने वाली कई चुनौतियों को भी वैज्ञानिकों ने समय के साथ हल किया. इस पूरी प्रक्रिया में किसानों की भूमिका भी अहम रही, जिन्होंने इन गायों को अपने खेतों में अपनाया और व्यावहारिक अनुभव साझा किए.
दूसरी नई नस्लें भी बनीं पहचान का हिस्सा
करन फ्रीज के अलावा जिन नस्लों को मान्यता मिली है, उनमें गाय, भैंस, बकरी, भेड़, मुर्गी और बतख तक शामिल हैं. झारखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड, नागालैंड, असम, केरल और ओडिशा जैसे राज्यों की कई स्थानीय नस्लों को अब राष्ट्रीय पहचान मिल गई है. इससे इन क्षेत्रों के किसानों को अपनी स्थानीय नस्लों पर गर्व करने और उन्हें आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा.
किसानों की आमदनी और भविष्य की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि नस्लों की यह मान्यता सीधे तौर पर किसानों की आमदनी से जुड़ी है. जब किसी नस्ल को आधिकारिक पहचान मिलती है, तो उस पर सरकारी योजनाएं, शोध और संरक्षण का ध्यान बढ़ता है. इससे बेहतर नस्ल सुधार, अधिक उत्पादन और स्थायी पशुपालन को बढ़ावा मिलता है. करन फ्रीज जैसी उच्च दूध देने वाली नस्लें आने वाले समय में देश की दुग्ध जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.