Khet Bachao Campaign: केंद्र सरकार के “खेत बचाओ” अभियान और रासायनिक उर्वरकों के कम उपयोग को लेकर झारखंड की कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कई सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि किसानों और पर्यावरण के हित में चलाए जा रहे अभियानों का असर जमीन पर भी दिखना चाहिए.
Kisan India के खास शो माइक पे मुलाकात में कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ( Shilpi Neha Tirkey) कहा कि एक ओर प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संरक्षण की बात की जाती है, जबकि दूसरी ओर देश के कई हिस्सों में जंगलों की कटाई और भूमि अधिग्रहण की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. उनके अनुसार, खेती, पर्यावरण और किसानों के भविष्य को लेकर गंभीर और दीर्घकालिक नीति की जरूरत है.
पर्यावरण संरक्षण पर सरकार की नीतियों पर उठाए सवाल
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए कई अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन कई बार उनके साथ जमीनी हकीकत मेल नहीं खाती. उन्होंने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस पर “एक पेड़ मां के नाम” जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए, जिनका उद्देश्य लोगों को पौधारोपण के लिए प्रेरित करना है. हालांकि, दूसरी ओर कई क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई भी हो रही है. उन्होंने कहा कि यदि पर्यावरण बचाना है तो केवल अभियान चलाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि नीतियों और योजनाओं में भी इसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए.
भारत में वनों की कटाई के प्रमुख मामले
तेलंगाना (हैदराबाद):- कांचा गची बावली के लगभग 400 एकड़ जंगल में विकास और आईटी पार्क परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए रोक लगाई.
मध्य प्रदेश:-माइनिंग, सड़क निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं के कारण कई क्षेत्रों में जंगलों की कटाई हुई.
मालवा सहित कई इलाकों में इसका असर पर्यावरण और तापमान पर देखने को मिला.
दिल्ली:- द्वारका के शाहबाद मोहम्मदपुर क्षेत्र में रेलवे विस्तार परियोजना के लिए लगभग 25,000 पेड़ काटे जाने की योजना थी. सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी.
हरियाणा:- अरावली क्षेत्र के मांगड़ बानी जैसे जैव विविधता वाले क्षेत्रों में अवैध कटाई और अतिक्रमण के मामले सामने आए. विशेषज्ञों के अनुसार, पर्याप्त कानूनी सुरक्षा के अभाव में वन क्षेत्र प्रभावित हुए हैं.
खाद संकट और आयात पर निर्भरता बनी चुनौती
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि देश में खाद संकट का एक बड़ा कारण उर्वरकों के लिए विदेशों पर निर्भरता है. भारत यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसी खादों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधा, प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतें और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के कारण कई बार किसानों को खाद की कमी का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करना चाहती है तो इसके लिए किसानों को पर्याप्त विकल्प और संसाधन उपलब्ध कराने होंगे.
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत
कृषि मंत्री ने कहा कि किसानों को प्राकृतिक और टिकाऊ खेती की ओर ले जाने के लिए व्यापक स्तर पर काम करने की जरूरत है. इसके लिए प्रशिक्षण, जैविक विकल्पों की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी. उन्होंने कहा कि खेती को लाभकारी बनाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता देना जरूरी है. उनके अनुसार, किसानों की आय, मिट्टी की उर्वरता और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और इन्हें साथ लेकर चलने वाली नीतियां ही भविष्य में बेहतर परिणाम दे सकती हैं.