आंवला की खेती में छुपे ये 8 बड़े दुश्मन, समय रहते नहीं संभले तो चौपट हो सकती है फसल
विटामिन C से भरपूर आंवले की मांग दवा कंपनियों, जूस उद्योग और घरेलू उपयोग तीनों ही स्तर पर तेजी से बढ़ी है. यही वजह है कि कम खर्च और अपेक्षाकृत कम देखभाल वाली इस फसल को किसान बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं. लेकिन उस पर लगने वाले रोग भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं.
Amla diseases: आंवला, जिसे भारत में ‘अमृत फल’ कहा जाता है, आज सिर्फ आयुर्वेद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खेती के लिहाज से भी यह किसानों की पसंदीदा फसलों में शामिल हो चुका है. विटामिन C से भरपूर आंवले की मांग दवा कंपनियों, जूस उद्योग और घरेलू उपयोग तीनों ही स्तर पर तेजी से बढ़ी है. यही वजह है कि कम खर्च और अपेक्षाकृत कम देखभाल वाली इस फसल को किसान बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं. लेकिन जैसे-जैसे आंवले की खेती बढ़ी है, वैसे-वैसे उस पर लगने वाले रोग भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं. अगर समय रहते इन बीमारियों की पहचान और सही उपचार न किया जाए, तो पूरी फसल चौपट हो सकती है और मेहनत पर पानी फिर सकता है.
झुलसा रोग से सबसे ज्यादा खतरा
आंवले के बागानों में झुलसा रोग तेजी से फैलता है. इस रोग में पेड़ की टहनियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा तना प्रभावित हो जाता है. कई मामलों में इससे 40 से 50 प्रतिशत तक नुकसान देखा गया है. विशेषज्ञों के अनुसार बागान में साफ-सफाई बनाए रखना सबसे जरूरी है. साथ ही कार्बेन्डाजिम या मैन्कोजेब जैसे फफूंदनाशकों का सही मात्रा में छिड़काव करने से इस रोग पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है.
धब्बा रोग से घटती पत्तियों की ताकत
बरसात के दिनों में पत्तियों पर पानी जैसे छोटे-छोटे धब्बे दिखाई देना धब्बा रोग का संकेत होता है. समय के साथ ये धब्बे जलने जैसे नजर आने लगते हैं और पत्तियां कमजोर हो जाती हैं. इससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है. इस स्थिति में कैप्टॉन या कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करना लाभकारी माना गया है.
एन्थ्रेक्नोज से फल झड़ने की समस्या
एन्थ्रेक्नोज रोग आंवले के लिए बेहद नुकसानदायक होता है, क्योंकि इसमें पत्तियों, फूलों और फलों पर काले धब्बे बनते हैं. फल समय से पहले गिरने लगते हैं और जो फल बचते भी हैं, उनकी गुणवत्ता बाजार के लायक नहीं रहती. संक्रमित टहनियों और पत्तियों को हटाकर नष्ट करना और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव इस रोग के नियंत्रण में मदद करता है.
रतुआ रोग में नारंगी फफोले बनते हैं
जब पत्तियों और शाखाओं पर नारंगी रंग के फफोले दिखाई दें, तो यह रतुआ रोग का संकेत होता है. यह रोग जुलाई से सितंबर के बीच ज्यादा फैलता है. डाइथेन-जेड 78 या वेटएबल सल्फर का नियमित अंतराल पर छिड़काव करने से इस बीमारी को रोका जा सकता है.
फफूंदी रोग से रुक जाती है बढ़वार
फफूंदी रोग में पत्तियों पर सफेद या धूसर रंग की परत जम जाती है, जिससे पौधा सूर्य की रोशनी ठीक से नहीं ले पाता. इससे प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है और पौधा कमजोर पड़ने लगता है. बोर्डो मिश्रण का छिड़काव और पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना इस समस्या का प्रभावी समाधान है.
सूटी मोल्ड से काली परत की परेशानी
सूटि मोल्ड रोग में पत्तियों और टहनियों पर काली मखमली परत जम जाती है. यह रोग आमतौर पर रस चूसने वाले कीटों के कारण फैलता है. कीट नियंत्रण के साथ-साथ वेटएबल सल्फर या लैम्ब्डा सायहलोथ्रिन का छिड़काव करने से राहत मिलती है.
ब्लू मोल्ड से खराब होते फल
भंडारण या तुड़ाई के बाद अगर फलों पर भूरे धब्बे बनकर नीले रंग में बदलने लगें, तो यह ब्लू मोल्ड रोग हो सकता है. इससे फल पूरी तरह खराब हो जाते हैं. फलों को संभालकर रखने और बोरेक्स या सोडियम क्लोराइड से उपचार करने की सलाह दी जाती है.
गीली सड़न से तुड़ाई के समय नुकसान
नवंबर-दिसंबर में गीली सड़न रोग ज्यादा देखने को मिलता है. इस दौरान फलों पर काले और भूरे धब्बे बन जाते हैं. तुड़ाई के समय फलों को चोट से बचाना और जरूरत पड़ने पर डाइथेन एम-45 या कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करना जरूरी है.
सही समय पर इलाज ही बचाव
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आंवले की खेती में रोगों से डरने की जरूरत नहीं है, बस समय पर पहचान और सही उपचार जरूरी है. नियमित निरीक्षण, संतुलित खाद, साफ-सफाई और वैज्ञानिक तरीके से दवाओं का इस्तेमाल कर किसान न सिर्फ अपनी फसल बचा सकते हैं, बल्कि अच्छी गुणवत्ता के साथ बेहतर दाम भी पा सकते हैं.