न पानी की चिंता, न खर्च ज्यादा… बंजर जमीन में इस फल की खेती से होगी छप्परफाड़ कमाई

बेल की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह विपरीत परिस्थितियों में भी आसानी से पनप जाता है. गर्म जलवायु, हल्की से मध्यम बारिश और तेज धूप बेल के पौधे के लिए अनुकूल मानी जाती है. जिन राज्यों में गर्मी लंबी रहती है, वहां बेल का विकास बेहतर होता है.

नई दिल्ली | Published: 12 Feb, 2026 | 11:51 AM

Bael cultivation: मौसम में लगातार हो रहे बदलाव, खेती की बढ़ती लागत और अनिश्चित बाजार भाव ने किसानों को नई सोच अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है. अब किसान ऐसी फसलों की तलाश में हैं, जिनमें पानी कम लगे, खर्च कम हो और बाजार में मांग बनी रहे. इसी जरूरत को पूरा करता है बेल का पौधा. बेल को आयुर्वेद में औषधीय फल माना गया है और गर्मियों में इसके शरबत की मांग गांव से लेकर शहरों तक तेजी से बढ़ जाती है. यही वजह है कि बेल की खेती आज किसानों के लिए सुरक्षित और लंबे समय तक कमाई देने वाला विकल्प बनती जा रही है.

जलवायु और जमीन

बेल की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह विपरीत परिस्थितियों में भी आसानी से पनप जाता है. गर्म जलवायु, हल्की से मध्यम बारिश और तेज धूप बेल के पौधे के लिए अनुकूल मानी जाती है. जिन राज्यों में गर्मी लंबी रहती है, वहां बेल का विकास बेहतर होता है. यह फल बंजर जमीन, लाल मिट्टी और हल्की पथरीली जमीन में भी उगाया जा सकता है. जिन किसानों के पास उपजाऊ जमीन नहीं है, उनके लिए बेल खेती को खेती योग्य बना देता है.

बेल की खेती की पूरी प्रक्रिया, कब और कैसे करें शुरुआत

बेल की खेती की शुरुआत आमतौर पर फरवरी से जुलाई के बीच की जा सकती है. पौधों के लिए गड्ढे पहले से तैयार कर लिए जाते हैं, जिनमें गोबर की सड़ी खाद और मिट्टी मिलाकर भराव किया जाता है. बेल का पौधा बीज से भी उगाया जा सकता है, लेकिन कलमी या ग्राफ्टेड पौधों से जल्दी फल मिलना शुरू हो जाता है. रोपाई के बाद शुरुआती एक-दो साल पौधों की देखभाल जरूरी होती है. एक बार पौधा जम गया, तो यह कई सालों तक फल देता रहता है.

सिंचाई की बात करें तो बेल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. गर्मियों में हल्की सिंचाई और बरसात में जलभराव से बचाव जरूरी है. जरूरत से ज्यादा पानी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है. समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से पौधे की बढ़वार अच्छी होती है.

रोग और कीट कम, फिर भी सतर्कता जरूरी

बेल की खेती में रोग और कीट का प्रकोप बहुत कम देखा जाता है. यही वजह है कि यह नए किसानों के लिए भी भरोसेमंद फसल मानी जाती है. हालांकि जब पौधे में नई पत्तियां आती हैं, उस समय पत्ती खाने वाले कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं. इस स्थिति में जैविक उपायों से ही नियंत्रण किया जा सकता है. नीम आधारित घोल या जैविक छिड़काव से फसल सुरक्षित रहती है और रासायनिक दवाओं पर खर्च नहीं बढ़ता.

सही किस्म का चुनाव बढ़ाता है मुनाफा

बेल की खेती में सही किस्म का चयन बहुत अहम होता है. सीआईएसएच-2, सीआईएसएच-4, नरेंद्र बेल-5, 6, 16 और 17 जैसी किस्में बेहतर उत्पादन के लिए जानी जाती हैं. इसके अलावा इटावा, बनारसी और कागजी गूदा वाली किस्मों की बाजार में अच्छी मांग रहती है. एक अच्छी तरह तैयार बेल का वजन दो से ढाई किलो तक हो सकता है. बड़े आकार और ज्यादा गूदे वाले फल बाजार में ज्यादा दाम दिलाते हैं.

सेहत से जुड़ा फल, इसलिए बाजार में बनी रहती है मांग

बेल सिर्फ खाने का फल नहीं है, बल्कि सेहत से जुड़ा उत्पाद भी है. गर्मियों में बेल का शरबत शरीर को ठंडक देता है और लू से बचाव करता है. पेट से जुड़ी समस्याओं में भी इसका उपयोग किया जाता है. इसी वजह से गर्मी शुरू होते ही बेल की मांग तेजी से बढ़ जाती है और किसानों को अच्छे भाव मिलने लगते हैं.

वैल्यू एडिशन से कई गुना बढ़ सकती है कमाई

बेल की खेती की सबसे बड़ी ताकत इसकी प्रोसेसिंग में है. किसान केवल कच्चा फल बेचने तक सीमित न रहें, तो उनकी आमदनी कई गुना बढ़ सकती है. बेल से शरबत, कैंडी, पाउडर और अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं, जिनकी शहरों में अच्छी मांग रहती है. स्थानीय स्तर पर छोटे स्तर की प्रोसेसिंग या स्वयं सहायता समूहों के साथ जुड़कर किसान स्थायी बाजार बना सकते हैं.

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