चॉकलेट की बढ़ती मांग और बजट 2026 का सपोर्ट, जानें कैसे शुरू करें कोको की खेती

कोको की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे अकेले नहीं, बल्कि नारियल, सुपारी या केले जैसे पौधों के साथ लगाया जा सकता है. इससे एक ही जमीन से कई फसलों की कमाई होती है. नारियल और सुपारी की छाया में कोको के पौधे अच्छी तरह पनपते हैं.

नई दिल्ली | Published: 2 Feb, 2026 | 12:18 PM

Cocoa farming: आज की खेती पहले जैसी आसान नहीं रह गई है. बीज, खाद, पानी और मजदूरी हर चीज का खर्च बढ़ गया है. ऊपर से मौसम भी अब भरोसेमंद नहीं रहा. ऐसे समय में किसान ऐसी फसल चाहते हैं, जिसमें जोखिम कम हो और आमदनी लंबे समय तक बनी रहे. इसी तलाश में अब कोको की खेती किसानों के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर उभरी है. चॉकलेट की बढ़ती मांग और सरकार की नई नीतियों ने कोको को आने वाले समय की बड़ी नकदी फसल बना दिया है.

कोको की खेती क्यों बन रही है किसानों की पसंद

कोको एक ऐसी फसल है, जिसकी मांग देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में लगातार बढ़ रही है. बच्चों से लेकर बड़ों तक, चॉकलेट आज हर घर की जरूरत बन चुकी है. चॉकलेट, कोको पाउडर और कोको बटर जैसे उत्पाद कोको बीन्स से ही तैयार होते हैं. खास बात यह है कि कोको का पौधा एक बार लग जाए, तो 20–25 साल तक फल देता रहता है. यानी बार-बार बोआई का खर्च नहीं और आमदनी लंबे समय तक चलती रहती है.

किस जलवायु और मिट्टी में कोको देता है सबसे अच्छा परिणाम

कोको की खेती के लिए गर्म और नमी वाला मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है. 18 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान में इसके पौधे अच्छी तरह बढ़ते हैं. बहुत ज्यादा ठंड, पाला या सूखा इसके लिए नुकसानदेह हो सकता है. मिट्टी की बात करें तो कोको को ऐसी जमीन पसंद है, जो गहरी, उपजाऊ और पानी की निकासी वाली हो. खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए, लेकिन नमी बनी रहना जरूरी है.

खेत की तैयारी और पौध रोपण का सही समय

कोको लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए, ताकि मिट्टी नरम हो जाए. इसके बाद सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की ताकत बढ़ती है. कोको के पौधे लगाने का सबसे अच्छा समय मानसून की शुरुआत माना जाता है. इस समय मिट्टी में प्राकृतिक नमी होती है, जिससे पौधे जल्दी जम जाते हैं और सिंचाई का खर्च भी कम पड़ता है.

अकेले नहीं, साथ में लगाएं कोको तो फायदा होगा दोगुना

कोको की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे अकेले नहीं, बल्कि नारियल, सुपारी या केले जैसे पौधों के साथ लगाया जा सकता है. इससे एक ही जमीन से कई फसलों की कमाई होती है. नारियल और सुपारी की छाया में कोको के पौधे अच्छी तरह पनपते हैं. पौधों के बीच करीब चार मीटर की दूरी रखना जरूरी होता है, ताकि धूप और हवा सही मात्रा में मिल सके.

सिंचाई और पोषण का संतुलन है जरूरी

कोको को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन मिट्टी सूखनी भी नहीं चाहिए. गर्मियों में हल्की सिंचाई काफी होती है. समय-समय पर जैविक खाद और संतुलित उर्वरक देने से पौधे मजबूत रहते हैं और फल भी ज्यादा आते हैं. अच्छी देखभाल से बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है.

कब शुरू होती है कमाई और कितना मुनाफा संभव

कोको के पौधे आमतौर पर तीसरे या चौथे साल से फल देना शुरू कर देते हैं. इसके बाद हर साल नियमित पैदावार मिलती है. बाजार में कोको बीन्स के अच्छे दाम मिलते हैं, खासकर अगर किसान बीन्स को सही तरीके से सुखाकर और साफ करके बेचें. यही वजह है कि कोको को लंबे समय की मुनाफे वाली खेती माना जाता है.

बजट 2026 ने कोको खेती को दी नई रफ्तार

केंद्रीय बजट 2026-27 में कोको की खेती को खास महत्व दिया गया है. सरकार का लक्ष्य है कि देश में कोको उत्पादन बढ़े और आयात पर निर्भरता कम हो. बजट में बेहतर पौध, तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता पर जोर दिया गया है. खासतौर पर तटीय और उपयुक्त इलाकों में कोको की खेती को बढ़ावा देने की योजना है. सरकार का विजन है कि 2030 तक भारतीय कोको को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में पहचान मिले.

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