Budget 2026 कृषि पर रहेगा फोकस! वित्त मंत्रालय एग्री सेक्टर को दे सकता है सौगात.. जानें क्या कुछ होगा खास
आगामी बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र को गति देने पर जोर रह सकता है. सहकारी खेती, पशुपालन, डेयरी और कृषि निर्यात को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाने की रणनीति बनाई जा रही है, खासकर एल नीनो जैसी जलवायु चुनौतियों को देखते हुए.
Agriculture Budget 2026: इस साल का बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने पर केंद्रित रह सकता है. प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने वित्त मंत्रालय से कृषि क्षेत्र की धीमी होती वृद्धि पर ध्यान देने को कहा है. बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि विकास दर 2024-25 में 4.6 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर लगभग 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है. बजट में सहकारी खेती को मजबूत करने और कृषि से जुड़े मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) को बढ़ावा देने के उपाय किए जा सकते हैं. सरकार का फोकस किसान समूहों को सशक्त बनाने, फसल कटाई के बाद के ढांचे (पोस्ट-हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर) को सुधारने और एग्रो-प्रोसेसिंग इकाइयों को समर्थन देने पर रहेगा, ताकि किसानों की आय बढ़े और ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर पैदा हों.
नीतिगत तौर पर छोटे और सीमांत किसानों को सहकारी संस्थाओं के जरिए जोड़ने पर जोर होगा. इससे उत्पादन में पैमाने की अर्थव्यवस्था (इकोनॉमी ऑफ स्केल), सप्लाई चेन का आधुनिकीकरण और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिलेगी. बजट प्रस्ताव ग्रामीण पुनरुत्थान के व्यापक एजेंडे के अनुरूप होंगे, जिससे टिकाऊ कृषि विकास के साथ-साथ आर्थिक विविधीकरण को भी बढ़ावा मिले.
खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच-छह वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है, लेकिन इसके बावजूद कृषि क्षेत्र की औसत सकल मूल्य वर्धित (GVA) वृद्धि दर 3-4 प्रतिशत के बीच ही रही है. इसकी प्रमुख वजहें कोविड महामारी और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याएं रही हैं. पिछले साल के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि अगर कृषि क्षेत्र में 5 प्रतिशत की स्थिर वृद्धि बनी रहती है और अर्थव्यवस्था में इसकी हिस्सेदारी 20 प्रतिशत रहती है, तो यह कुल GVA में 1 प्रतिशत का योगदान दे सकती है. हालांकि, कृषि मंत्रालय की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कृषि की हिस्सेदारी 2020-21 में 20.4 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 17.7 प्रतिशत रह गई है.
बीते कुछ वर्षों में ला नीना और एल नीनो जैसी मौसम घटनाओं ने भी कृषि को प्रभावित किया है. 2020, 2021, 2022 और 2025-26 में ला नीना के कारण अत्यधिक बारिश हुई, जबकि 2024 में एल नीनो से सूखा और गर्मी की लहरें देखी गईं, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचा.
कई हिस्सों में सूखा और लंबे समय तक शुष्क हालात रहे
कोविड के दौरान कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था का सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला सेक्टर था और GDP में इसका योगदान 20 प्रतिशत तक पहुंच गया था. हालांकि, इसके बाद यह घटकर 18-19 प्रतिशत के स्तर पर आ गया है. खेती के मुकाबले उससे जुड़े सहयोगी क्षेत्र, खासकर पशुपालन और डेयरी, किसानों की आय बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. साल 2024 में जब देश के कई हिस्सों में सूखा और लंबे समय तक शुष्क हालात रहे, जिससे फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ, तब डेयरी और पशुधन गतिविधियों ने किसानों को मजबूत सहारा दिया.
कृषि विकास को आगे बढ़ाने में सहयोगी क्षेत्र
पिछले साल के आर्थिक सर्वेक्षण में भी कहा गया था कि 2023-24 के दौरान कृषि विकास को आगे बढ़ाने में सहयोगी क्षेत्र अहम चालक बनकर उभरे. सर्वे के मुताबिक, अकेले पशुपालन क्षेत्र की कुल सकल मूल्य वर्धित (GVA) में हिस्सेदारी 5.5 प्रतिशत रही और इसकी कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 12.99 प्रतिशत दर्ज की गई, जो इसकी तेज और मजबूत वृद्धि को दर्शाती है. इस क्षेत्र का आर्थिक महत्व इसके बढ़ते उत्पादन मूल्य से भी साफ झलकता है, जो 2022-23 में बढ़कर 17.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. सरकार का सहकारी संस्थाओं पर बढ़ता फोकस भी इसी वजह से अहम माना जा रहा है.
करीब 10 करोड़ महिलाओं को सहकारी ढांचे से जोड़ा
दिसंबर 2025 तक राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस (NCD) के अनुसार देश में 8.5 लाख से ज्यादा सहकारी संस्थाएं दर्ज हैं, जिनमें से करीब 6.6 लाख सक्रिय हैं. ये सहकारी संस्थाएं 30 अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही हैं और लगभग 98 प्रतिशत ग्रामीण भारत को कवर करती हैं. इन सहकारी संस्थाओं से किसान, दुग्ध उत्पादक और मछुआरे जुड़े हुए हैं. साथ ही, महिला स्वयं सहायता समूहों की मजबूत भागीदारी ने करीब 10 करोड़ महिलाओं को सहकारी ढांचे से जोड़ा है. अमूल, नाबार्ड, कृभको और इफको जैसी संस्थाएं, हजारों स्थानीय समितियों और सहकारी संगठनों के साथ मिलकर, भारत की आर्थिक संरचना का एक मजबूत आधार स्तंभ बनी हुई हैं.
सामूहिक मॉडल किसानों को बेहतर सुरक्षा दे सकता है
इन पहलों के अलावा सरकार ने सहकारी क्षेत्र के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट लिमिटेड की स्थापना की है, जो सहकारी संस्थाओं के जरिए होने वाले निर्यात के लिए एक छतरी संगठन के तौर पर काम करेगी. सूत्रों के अनुसार, सहकारी संस्थाओं और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से खेती पर दिया जा रहा जोर ऐसे समय में काफी मददगार साबित होगा, जब वैश्विक मौसम एजेंसियों ने जुलाई के बाद एल नीनो के उभरने की संभावना जताई है. एल नीनो की स्थिति में खेती पर पड़ने वाले जोखिमों से निपटने में सामूहिक मॉडल किसानों को बेहतर सुरक्षा दे सकता है.
कृषि निर्यात बढ़ाने पर भी खास ध्यान देने की जरूरत
वहीं दूसरी ओर, सरकार को कृषि निर्यात बढ़ाने पर भी खास ध्यान देने की जरूरत है. इसके लिए कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) जैसी संस्थाओं को नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने पर फोकस करने को कहा जा सकता है. फिलहाल भारत का कृषि निर्यात मुख्य रूप से चावल, अनाज, मसाले, कॉफी, चाय और बागवानी उत्पादों तक सीमित है. सूत्रों का कहना है कि निर्यात टोकरी को और व्यापक करने की जरूरत है और दूसरे कृषि उत्पादों को भी आगे लाया जाना चाहिए. उनके मुताबिक, कृषि निर्यात को भारत की भू-राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बनाया जाना चाहिए.