गाय-बैल पालते हैं? तो जानिए कैसे गोबर से बना सकते हैं ईंट और कमा सकते हैं पैसा
ग्रामीण इलाकों में इन ईंटों से बने घर गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं. इससे बिजली और अन्य संसाधनों की भी बचत होती है. पुराने समय में बने मिट्टी और गोबर से बने मकान आज भी कई जगहों पर खड़े हैं, जो इनकी मजबूती और टिकाऊपन को साबित करते हैं.
Cow dung bricks: यह सच है कि गांवों में मौजूद संसाधनों को सही तरीके से समझ लिया जाए, तो रोजगार और कमाई के नए रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं. गाय-बैल पालने वाले किसानों और पशुपालकों के लिए ऐसा ही एक मौका है गोबर से ईंट बनाने का काम. अब तक जिस गोबर को सिर्फ खाद, कंडे या खेतों में डालने तक सीमित समझा जाता था, वही गोबर आज टिकाऊ निर्माण सामग्री बनकर आमदनी का मजबूत जरिया बन सकता है. खास बात यह है कि इस काम में न बड़ी पूंजी चाहिए, न महंगी मशीनें और न ही किसी बड़े कारखाने की जरूरत.
गोबर की ईंट क्यों बन रही है चर्चा का विषय
गोबर से बनने वाली ईंटें साधारण ईंटों से बिल्कुल अलग होती हैं. ये पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री से तैयार की जाती हैं, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. सीमेंट और पक्की ईंटों के मुकाबले इनमें कार्बन उत्सर्जन न के बराबर होता है. यही वजह है कि आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास की बात कर रही है, तब गोबर की ईंटें एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर रही हैं.
ग्रामीण इलाकों में इन ईंटों से बने घर गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं. इससे बिजली और अन्य संसाधनों की भी बचत होती है. पुराने समय में बने मिट्टी और गोबर से बने मकान आज भी कई जगहों पर खड़े हैं, जो इनकी मजबूती और टिकाऊपन को साबित करते हैं.
कम लागत में ज्यादा मुनाफे का मॉडल
गोबर की ईंट बनाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसकी लागत बेहद कम होती है. गांवों में गोबर, मिट्टी और चूना आसानी से मिल जाते हैं. पशुपालकों के लिए तो गोबर पहले से ही उपलब्ध रहता है, यानी कच्चे माल पर लगभग कोई खर्च नहीं.
एक गाय या बैल से रोज मिलने वाला गोबर अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो उससे लगातार ईंटें बनाई जा सकती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि यह काम सालभर चलने वाला है और इससे हर महीने नियमित आमदनी संभव है. धीरे-धीरे यही काम छोटे स्तर से बढ़कर एक स्थानीय उद्योग का रूप ले सकता है.
गोबर की ईंट कैसे तैयार होती है
गोबर की ईंट बनाने की प्रक्रिया बहुत जटिल नहीं है. ताजा गोबर, देसी मिट्टी और थोड़ी मात्रा में चूना मिलाकर एक खास मिश्रण तैयार किया जाता है. ध्यान यह रखा जाता है कि गोबर 24 घंटे से ज्यादा पुराना न हो, ताकि उसकी प्राकृतिक पकड़ बनी रहे.
इस मिश्रण को अच्छी तरह गूंथकर सांचे में डाला जाता है और फिर धूप में सुखाया जाता है. लगभग 15 दिन में ईंट पूरी तरह तैयार हो जाती है. खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में पानी का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है, जिससे यह तरीका कम वर्षा वाले इलाकों के लिए भी उपयुक्त है. राजस्थान जैसे सूखे राज्यों में यह तकनीक पहले ही कारगर साबित हो चुकी है.
निर्माण के कई कामों में उपयोग
गोबर की ईंटों का इस्तेमाल सिर्फ दीवार बनाने तक सीमित नहीं है. इन्हीं ईंटों और मिश्रण से प्लास्टर, छत की स्लैब और फर्श की मड फ्लोरिंग भी तैयार की जा सकती है. इससे पूरे घर का निर्माण एक ही प्राकृतिक तकनीक से संभव हो जाता है. ऐसे घर न सिर्फ सस्ते होते हैं, बल्कि रहने में भी आरामदायक होते हैं.
गांव और पर्यावरण दोनों को फायदा
गोबर की ईंटें बनने से एक तरफ जहां ग्रामीणों को रोजगार मिलता है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को भी बड़ा फायदा होता है. भट्ठों में जलने वाली कोयले की ईंटों से होने वाला प्रदूषण कम होता है और कार्बन उत्सर्जन पर भी रोक लगती है. इसके अलावा गोबर का सही उपयोग होने से गांवों में साफ-सफाई और स्वच्छता भी बेहतर होती है.
किन लोगों के लिए है यह काम सबसे फायदेमंद
छोटे किसान, जिनके पास ज्यादा जमीन नहीं लेकिन गाय-बैल हैं, उनके लिए यह काम बेहद उपयोगी साबित हो सकता है. पशुपालक, जिनके पास रोज गोबर उपलब्ध रहता है, इससे अतिरिक्त आय कमा सकते हैं. वहीं ग्रामीण युवा और उद्यमी इस तकनीक को अपनाकर इको-फ्रेंडली निर्माण सामग्री का छोटा व्यवसाय शुरू कर सकते हैं.
भविष्य की बड़ी संभावना
जिस तरह से पर्यावरण-अनुकूल निर्माण सामग्री की मांग बढ़ रही है, आने वाले समय में गोबर की ईंटों का बाजार भी तेजी से बढ़ सकता है. अगर सरकार और स्थानीय प्रशासन का सहयोग मिले, तो यह काम गांवों में आत्मनिर्भरता और रोजगार का मजबूत आधार बन सकता है.