गर्मी, ग्लोबल संकट और FTAs के बीच बदल रहा भारत का पशुधन उद्योग, CLFMA ने बताई बड़ी रणनीति

भारत का फीड और पशुधन उद्योग तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है. वैश्विक संकट, हीटवेव और नए FTAs के बीच उद्योग अब आत्मनिर्भरता, आधुनिक तकनीक और नए निर्यात बाजारों पर फोकस कर रहा है. CLFMA चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने किसानों, फीड गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को लेकर बड़ी बातें कहीं.

नोएडा | Published: 23 May, 2026 | 06:46 PM

Livestock Industry: भारत का पशुधन और फीड उद्योग तेजी से बदलते वैश्विक हालात के बीच नए अवसरों और चुनौतियों का सामना कर रहा है. वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाएं, पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु परिवर्तन और मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) जैसे मुद्दे अब इस सेक्टर की दिशा तय कर रहे हैं. इसी बीच भारत का कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA) उद्योग, किसानों और सरकार के बीच एक मजबूत कड़ी बनकर उभरा है.

भारत के कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA) के चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी (Divya Kumar Gulati) ने किसान इंडिया को बताया कि आने वाले वर्षों में भारत के पास पशु प्रोटीन उत्पादन में वैश्विक शक्ति बनने का बड़ा अवसर है, लेकिन इसके लिए आत्मनिर्भर फीड सिस्टम, आधुनिक तकनीक और बेहतर नीति समर्थन बेहद जरूरी होंगे.

CLFMA बना उद्योग और किसानों की आवाज

दिव्या कुमार गुलाटी के अनुसार, CLFMA देश के फीड और पशुधन उद्योग  का सर्वोच्च प्रतिनिधि संगठन है, जो पोल्ट्री, डेयरी, एक्वाकल्चर और अन्य संबंधित क्षेत्रों की आवाज को सरकार तक पहुंचाता है. संगठन नीतिगत सुधार, कच्चे माल की उपलब्धता और उद्योग से जुड़ी समस्याओं को लेकर लगातार सरकार के साथ संवाद करता है. उन्होंने कहा कि CLFMA केवल उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों, पशुपालकों, वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों को भी एक मंच पर लाने का काम करता है. सेमिनार, तकनीकी चर्चाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए संगठन फीड गुणवत्ता, उत्पादकता और नई तकनीकों की जानकारी किसानों तक पहुंचा रहा है.

वैश्विक संकटों के बीच बदल रहा उद्योग

गुलाटी ने बताया कि रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज  जैसे समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव ने भारत के पशुधन और फीड उद्योग को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर किया है. पहले जहां उद्योग कुछ सीमित बाजारों पर निर्भर था, वहीं अब अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे नए बाजारों की ओर तेजी से विस्तार हो रहा है. उन्होंने कहा कि अब कंपनियां केवल कम लागत पर ध्यान नहीं दे रहीं, बल्कि सप्लाई चेन को मजबूत बनाने, कोल्ड स्टोरेज, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम पर भी निवेश कर रही हैं. प्रोसेस्ड और वैल्यू-ऐडेड उत्पादों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि ये लॉजिस्टिक संकटों से कम प्रभावित होते हैं और बेहतर मुनाफा देते हैं.

आत्मनिर्भर फीड सिस्टम पर जोर

दिव्या कुमार गुलाटी ने कहा कि भारत को सोयाबीन और मक्का  जैसे प्रमुख फीड कच्चे माल के आयात पर निर्भरता कम करनी होगी. इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने, बेहतर बीज, आधुनिक खेती तकनीकों और वैकल्पिक फीड सामग्री को बढ़ावा देने की जरूरत है. उन्होंने बताया कि राइस ब्रान, ऑयलसीड मील और DDGS जैसे विकल्प भविष्य में फीड उद्योग को अधिक मजबूत बना सकते हैं. साथ ही स्टोरेज, प्रोसेसिंग और सप्लाई नेटवर्क में निवेश से लागत कम होगी और किसानों को भी बेहतर लाभ मिलेगा.

श्रिम्प और पोल्ट्री सेक्टर के लिए नई चुनौतियां

गुलाटी के मुताबिक, श्रिम्प और पोल्ट्री सेक्टर  में फीड की गुणवत्ता सबसे अहम भूमिका निभाती है. संतुलित पोषण और उच्च गुणवत्ता वाला फीड न केवल उत्पादन बढ़ाता है, बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत करता है. इससे झींगा पालन में मृत्यु दर कम होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा बढ़ती है. उन्होंने यह भी कहा कि हीटवेव और जलवायु परिवर्तन का पोल्ट्री उद्योग पर गंभीर असर पड़ रहा है. अत्यधिक गर्मी के कारण पक्षियों की फीड खपत घटती है, अंडा उत्पादन कम होता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है. ऐसे में आधुनिक वेंटिलेशन सिस्टम, कूलिंग तकनीक और बेहतर पोषण प्रबंधन की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है.

FTAs और निर्यात में नए अवसर

दिव्या कुमार गुलाटी ने कहा कि भारत-EU सहित कई FTAs भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोल सकते हैं. खासकर श्रिम्प निर्यात को यूरोप जैसे बड़े बाजारों में फायदा मिल सकता है. हालांकि, इसके लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता  और ट्रेसबिलिटी मानकों को सख्ती से अपनाना होगा. उन्होंने कहा कि FTAs को संतुलित तरीके से लागू करना जरूरी है ताकि छोटे किसान और फीड निर्माता विदेशी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित न हों. डेयरी और पशुधन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षा देने के साथ-साथ घरेलू उद्योग को मजबूत बनाना भी बेहद आवश्यक होगा.

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