अफवाहों के जाल में फंसा पोल्ट्री सेक्टर, चिकन और अंडों को लेकर सच्चाई जानकर चौंक जाएंगे आप

Chicken Myths: भारत का पोल्ट्री सेक्टर इस समय बीमारियों से नहीं बल्कि तेजी से फैल रही अफवाहों से जूझ रहा है. चिकन और अंडों को लेकर फैली गलत धारणाएं बाजार, किसानों और लोगों के पोषण पर असर डाल रही हैं. विशेषज्ञों ने इन मिथकों को खारिज करते हुए लोगों से सिर्फ वैज्ञानिक और भरोसेमंद जानकारी पर भरोसा करने की अपील की.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 24 Apr, 2026 | 04:35 PM

Poultry Industry India: भारत का पोल्ट्री सेक्टर आज किसी महामारी, उत्पादन संकट या सप्लाई की कमी से नहीं, बल्कि अफवाहों के जाल से जूझ रहा है. हैरानी की बात है कि जिस उद्योग ने देश को सस्ता और सुलभ प्रोटीन दिया, वही अब गलत जानकारियों के कारण भरोसे के संकट में है. Vets In Poultry (VIP) की ओर से आयोजित एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये मुद्दा गंभीरता से उठाया गया. विशेषज्ञों ने साफ कहा कि देशभर में चिकन और अंडों को लेकर 200 से ज्यादा मिथक फैल चुके हैं, जो न सिर्फ उपभोक्ताओं को भ्रमित कर रहे हैं, बल्कि किसानों की आजीविका पर भी सीधा असर डाल रहे हैं.

बाजार में अफवाहों का असर

आज के सोशल मीडिया के दौर  में जानकारी जितनी तेजी से फैलती है, उतनी ही तेजी से गलत जानकारी (Fake News Impact) भी लोगों तक पहुंचती है. पोल्ट्री सेक्टर इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है. एक छोटी सी अफवाह-चाहे वह बर्ड फ्लू से जुड़ी हो या प्लास्टिक अंडों जैसी मिथक बाजार को हिला देती है. विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो या मैसेज से ही चिकन और अंडों की मांग  अचानक गिर जाती है. इसका सीधा नुकसान उन किसानों को होता है, जो पहले से सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं. सप्लाई चेन टूटती है, कीमतें गिरती हैं और मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता. सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन अफवाहों का अक्सर कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं होता.

मिथक बनाम सच्चाई

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिथक बनाम सच्चाई के जरिए कई भ्रमों को दूर किया गया. सबसे आम मिथक ये है कि चिकन में ग्रोथ हार्मोन  का इस्तेमाल होता है. विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह न तो व्यावहारिक है और न ही आर्थिक रूप से संभव. इसी तरह एंटीबायोटिक्स के उपयोग को लेकर भी भ्रम है. वास्तव में इसका उपयोग सख्त नियमों और निगरानी के तहत होता है. बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों के दौरान भी अगर चिकन को सही तरीके से पकाया जाए, तो वह पूरी तरह सुरक्षित रहता है. अंडों को लेकर भी कई गलतफहमियां हैं-जैसे भूरे और सफेद अंडों में पोषण का अंतर. वैज्ञानिक रूप से दोनों में कोई फर्क नहीं होता. इसके साथ ही कई ऐसे मिथक हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे. जैसे- बच्चों, बुखार या बीमारी से ठीक होने के समय अंडा नहीं खाना चाहिए, प्लास्टिक के अंड़ें इत्यादी.

प्लास्टिक अंडों की अफवाह

हाल के समय में प्लास्टिक अंडों का मुद्दा सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ है. विशेषज्ञों ने इसे पूरी तरह झूठा बताया. उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर नकली अंडे बनाना न तो संभव है और न ही आर्थिक रूप से फायदेमंद. अंडों में जो छोटे-मोटे अंतर दिखते हैं-जैसे जर्दी का रंग या छिलके की बनावट-वह पूरी तरह प्राकृतिक हैं. यही सामान्य अंतर कई बार लोगों को भ्रमित कर देती हैं.
इस स्थिति में सही जानकारी का प्रसार बेहद जरूरी है. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India) जैसी संस्थाएं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

क्यों जरूरी हैं चिकन और अंडे

चिकन और अंडे  सिर्फ एक खाद्य उत्पाद नहीं, बल्कि भारत की पोषण सुरक्षा की रीढ़ हैं. ये सस्ते, आसानी से उपलब्ध और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन के स्रोत हैं. बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान है. अगर लोग अफवाहों के कारण इनका सेवन कम करते हैं, तो इसका असर सिर्फ व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे देश के पोषण स्तर को प्रभावित करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण जैसी समस्याओं से लड़ने में पोल्ट्री उत्पादों की भूमिका बेहद अहम है. ऐसे में गलत धारणाएं इस लड़ाई को और कठिन बना देती हैं.

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