ईरान-पश्चिम एशिया संघर्ष से भारतीय सीफूड निर्यात पर बुरा असर देखा गया है. भारतीय मिश्रित पशु आहार निर्माता संघ ने कहा है कि सीफूड निर्यात में रुकावट से लगभग 2,490 करोड़ रुपये से अधिक के निर्यात पर असर पड़ा है. बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई दरों में 5 गुना तक बढ़ोत्तरी ने निर्यातकों को आर्थिक चोट पहुंचाई है. एसोसिएशन ने कहा कि लॉजिस्टिक्स और लागत के दबाव के जरिए पोल्ट्री और फीड से जुड़े सेक्टरों पर भी इसका दूरगामी असर हुआ है.
2,490 करोड़ रुपये से अधिक के निर्यात पर असर
भारतीय मिश्रित पशु आहार निर्माता संघ (CLFMA) के चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने किसान इंडिया को बताया कि सीफूड के मामले में रुकावट काफी बड़ी रही है. लगभग 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 2,490 करोड़ रुपये से अधिक के निर्यात पर असर पड़ा है, खाड़ी देशों के बाजारों में मात्रा में 10–20% की गिरावट आई है. उन्होंने बताया कि लगभग 20–25% खेप रास्ता बदलने या रद्द होने की वजह से प्रभावित हुई हैं.
शिपिंग के मुख्य रास्ते अस्थिर हो गए हैं, जिससे जहाजों को केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे रास्तों से जाना पड़ रहा है. इससे सफर का समय 10–20 दिन बढ़ गया है और माल ढुलाई व ईंधन की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है. इसकी वजह से बंदरगाहों पर भीड़, कंटेनरों की कमी और इन्वेंट्री का जमाव हो गया है.
भारत सीफूड एक्सपोर्ट में मुख्य रूप से झींगा (श्रिम्प), टूना, स्क्विड, कटलफिश, लॉब्स्टर, केकड़ा और कई तरह की समुद्री मछलियां विदेशों में भेजता है. भारतीय सीफूड की सबसे ज्यादा मांग अमेरिका, चीन, जापान, यूरोप और पश्चिम एशिया के देशों में रहती है.
बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई दरों में 5 गुना तक बढ़ोत्तरी
चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने बताया कि खेप कोल्ड स्टोरेज में फंसी हुई हैं, जिससे ऑपरेशनल लागत बढ़ गई है और खराब होने का जोखिम भी बढ़ गया है. साथ ही युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की दरें तेजी से 2–5 गुना तक बढ़ी हैं. इससे निर्यातकों का मुनाफा कम हो गया है, क्योंकि वे इन लागतों को पूरी तरह से खरीदारों पर नहीं डाल सकते. मांग के लिहाज से पश्चिम एशिया को होने वाले सीफूड निर्यात पर पर्यटन में आई सुस्ती का असर पड़ा है. इससे होटलों और रेस्तरां में खपत कम हुई है और खरीदारों की मांग कमजोर हुई है.
उन्होंने कहा कि यूरोप में हालांकि मांग स्थिर बनी हुई है, लेकिन स्वेज नहर मार्ग में आई रुकावटों की वजह से खेप में देरी हो रही है या उन्हें टाल दिया जा रहा है.
पोल्ट्री और पशुधन के अन्य उत्पादों पर इसका असर ज्यादा है, लेकिन फिर भी यह काफी अहम है.
इनपुट पर दबाव झेल रही फीड इंडस्ट्री
खाड़ी के बाजारों में निर्यात में आई रुकावटों और मांग में उतार-चढ़ाव की वजह से खेप में देरी, कीमतों में अस्थिरता और कभी-कभी घरेलू बाजार में उत्पादों की अधिकता हो गई है, जिससे किसानों की कमाई पर असर पड़ा है. फीड उद्योग निर्यात पर कम निर्भर है, लेकिन उसे इनपुट के मोर्चे पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है. इसकी वजह ईंधन, लॉजिस्टिक्स और एडिटिव्स व कच्चे माल के आयात की बढ़ती लागत है. पूरी सप्लाई चेन में माल ढुलाई और बीमा की बढ़ती लागत उत्पादन लागत को भी बढ़ा रही है.