India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार बातचीत में खेती से जुड़े मुद्दे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं. दोनों देश व्यापार बढ़ाने की बात कर रहे हैं, लेकिन कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर भारत कोई समझौता करने को तैयार नहीं है. आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलें इन्हीं मुद्दों में सबसे अहम मानी जा रही हैं. सरकार ने साफ कर दिया है कि देश के किसानों, जमीन और लोगों की सेहत से जुड़े मामलों में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लिया जाएगा.
जीएम सोयाबीन और मक्का पर भारत अडिग
व्यापार वार्ता से जुड़े सूत्रों के मुताबिक भारत ने अमेरिका को स्पष्ट रूप से बता दिया है कि जीएम सोयाबीन और जीएम मक्का के आयात की अनुमति नहीं दी जाएगी. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले ही कई मौकों पर कह चुके हैं कि संवेदनशील क्षेत्रों में कोई समझौता नहीं होगा. सरकार का मानना है कि जीएम फसलों का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण, जैव विविधता और उपभोक्ताओं की सेहत पर भी पड़ सकता है. यही वजह है कि इस मुद्दे पर भारत की नीति बिल्कुल साफ है.
अमेरिका की उम्मीदें, लेकिन भारत की सीमाएं
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल में कहा है कि भारत अमेरिका से ज्यादा कृषि उत्पाद खरीदेगा. अमेरिकी कृषि विभाग का भी मानना है कि भारत की बड़ी आबादी उनके किसानों के लिए बड़ा बाजार साबित हो सकती है. अमेरिका का तर्क है कि इससे दोनों देशों के बीच कृषि व्यापार का घाटा कम होगा, जो 2024 में करीब 1.3 अरब डॉलर था.
हालांकि भारतीय अधिकारियों का कहना है कि व्यापार बढ़ाने की इच्छा अपनी जगह है, लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है. भारत पहले से ही अमेरिका समेत कई देशों से सोयाबीन तेल आयात करता है, लेकिन इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी बहुत कम है. इसके अलावा सोयाबीन तेल पर भारत में पहले से ही ऊंचा आयात शुल्क लगता है.
तेल और बीज में फर्क समझना जरूरी
भारत सरकार यह साफ करती रही है कि सोयाबीन तेल और सोयाबीन बीज को एक नजर से नहीं देखा जा सकता. तेल एक प्रोसेस्ड उत्पाद है, जबकि बीज सीधे खेती और खाद्य श्रृंखला से जुड़ा होता है. इसी वजह से सरकार ने सोयाबीन तेल पर शुल्क में थोड़ी राहत देने के संकेत तो दिए हैं, लेकिन जीएम सोयाबीन और मक्का जैसे बीजों के आयात पर कोई नरमी नहीं दिखाई है. अमेरिका चाहता है कि भारत जीएम फसलों को भी मंजूरी दे, लेकिन फिलहाल यह मांग पूरी होती नहीं दिख रही है.
सेब और ड्राई फ्रूट्स पर नरम रुख
जहां जीएम फसलों के मुद्दे पर भारत सख्त नजर आ रहा है, वहीं कुछ अन्य कृषि उत्पादों पर संतुलित रुख अपनाया गया है. ताजे फलों के कारोबार से जुड़े लोगों को उम्मीद है कि अमेरिका से आने वाले सेब पर आयात शुल्क कम किया जा सकता है. चर्चा है कि सीमित मात्रा में सेब या तो शून्य शुल्क पर या फिर कम शुल्क के साथ आयात किए जा सकते हैं.
इसी तरह ड्राई फ्रूट्स के मामले में भी कुछ राहत की संभावना जताई जा रही है. पिस्ता और हेजलनट जैसे मेवे भारत में बहुत कम मात्रा में उगाए जाते हैं या बिल्कुल नहीं होते. ऐसे में इन पर सीमित कोटे के साथ शुल्क में छूट दी जा सकती है. इससे बाजार में उपलब्धता बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को भी कुछ राहत मिल सकती है.
किसानों और बाजार के बीच संतुलन की कोशिश
सरकार की नीति साफ नजर आती है. एक तरफ घरेलू किसानों और खेती को सुरक्षित रखना है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी बढ़ावा देना है. जीएम फसलों पर सख्ती इसी नीति का हिस्सा है, जबकि सेब और ड्राई फ्रूट्स जैसे उत्पादों पर नरमी बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखकर दिखाई जा रही है.