Saffron cultivation Lambasingi: आंध्र प्रदेश की खेती अब धीरे-धीरे एक नए रास्ते पर बढ़ती नजर आ रही है. सरकार का फोकस अब सिर्फ ज्यादा पैदावार पर नहीं, बल्कि ऐसी खेती पर है जो किसान, जमीन और उपभोक्ता तीनों के लिए फायदेमंद हो. इसी सोच के तहत राज्य सरकार ने लांबासिंगी जैसे ठंडे और पहाड़ी इलाके में केसर की खेती की योजना बनाई है. यह पहल न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ा सकती है, बल्कि आंध्र प्रदेश को प्राकृतिक खेती के बड़े केंद्र के रूप में पहचान दिला सकती है.
प्राकृतिक खेती को लेकर सरकार की नई सोच
अमरावती में हुई कृषि समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने साफ कहा कि राज्य को देश का सबसे बड़ा प्राकृतिक खेती केंद्र बनाया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि फिलहाल आंध्र प्रदेश में करीब 18 लाख किसान प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं और लगभग 20 लाख एकड़ जमीन पर यह खेती हो रही है. मुख्यमंत्री का मानना है कि रासायनिक खाद और दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी कमजोर होती है और लोगों की सेहत पर भी असर पड़ता है. इसलिए अब खेती को सुरक्षित और टिकाऊ बनाना जरूरी है.
लांबासिंगी में केसर की खेती क्यों खास है
लांबासिंगी आंध्र प्रदेश का ऐसा इलाका है जहां ठंड ज्यादा रहती है. यहां का मौसम केसर जैसी महंगी और नाजुक फसल के लिए उपयुक्त माना जा रहा है. सरकार चाहती है कि यहां बड़े स्तर पर केसर की खेती शुरू की जाए. यह काम पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत होगा, ताकि निजी कंपनियों के साथ मिलकर बेहतर तकनीक और बाजार से जुड़ाव मिल सके. इस योजना में स्थानीय आदिवासी किसानों को भी शामिल किया जाएगा, जिससे उन्हें रोजगार और स्थायी आय का साधन मिल सके.
खेती में भरोसा बढ़ाने के लिए प्रमाणन जरूरी
प्राकृतिक खेती के उत्पादों की पहचान और कीमत तभी बढ़ सकती है, जब उनकी गुणवत्ता पर लोगों को भरोसा हो. इसी वजह से मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि अप्रैल तक प्राकृतिक खेती के लिए ट्रेसबिलिटी और सर्टिफिकेशन की व्यवस्था पूरी कर ली जाए. इससे ग्राहक यह जान पाएंगे कि फल, सब्जी या अनाज कहां और किस तरीके से उगाया गया है. सरकार को उम्मीद है कि इससे राज्य के उत्पाद देश और विदेश दोनों जगह अच्छी कीमत पर बिकेंगे.
किसानों और छात्रों को मिलेगा प्रशिक्षण
सरकार प्राकृतिक खेती को सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखना चाहती. इसके लिए पूरे राज्य में प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की तैयारी है. इन कार्यक्रमों में किसानों को बिना रसायन के खेती करने के आसान तरीके बताए जाएंगे. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कृषि की पढ़ाई कर रहे छात्रों को खुद प्राकृतिक खेती करनी चाहिए, ताकि वे किताबों के साथ जमीन पर काम का अनुभव भी हासिल कर सकें.
निर्यात और नई योजनाओं पर भी जोर
बैठक में यह भी बताया गया कि अमेरिका और यूरोप के साथ हुए व्यापार समझौतों से झींगा, सूखी मिर्च, आम, चावल और प्रोसेस्ड फूड के निर्यात के नए मौके बने हैं. मुख्यमंत्री ने कहा कि इन मौकों का पूरा फायदा तभी मिलेगा, जब गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जाए. इसके अलावा एलुरु जिले में 500 एकड़ में कोको सिटी बनाने की योजना भी सामने आई है, जहां कोको की खेती से लेकर उसकी प्रोसेसिंग और बिक्री तक की पूरी व्यवस्था होगी.
खेती और पर्यटन को जोड़ने की कोशिश
मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि जैसे कुप्पम में फूलों का उत्सव हुआ, वैसे ही अलग-अलग इलाकों में फसल उत्सव आयोजित किए जाएं. इससे लोगों को खेती के बारे में जानकारी मिलेगी और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. उन्होंने यह भी कहा कि अगर फसलों को बाजार तक पहुंचाने की लागत कम की जाए, तो किसानों को ज्यादा मुनाफा मिल सकता है. इसके लिए जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार से विशेष ट्रेन या रेलवे वैगन की मांग की जा सकती है.