Animal Health : गाय-भैंस पालने वाले हर पशुपालक की एक ही चिंता होती है कि दूध कैसे बढ़े, पशु कैसे स्वस्थ रहें और खर्च कैसे घटे. अक्सर इस चक्कर में महंगे सप्लीमेंट, दवाइयां और बाजार से खरीदा चारा इस्तेमाल किया जाता है. नतीजा यह होता है कि दूध तो थोड़ा बढ़ता है. लेकिन लागत इतनी ज्यादा हो जाती है कि मुनाफा हाथ नहीं आता. ऐसे समय में एक देसी और सस्ता तरीका सामने आया है, जिसने यह साबित कर दिया है कि सही हरा चारा पशुपालन की तस्वीर बदल सकता है.
महंगे उपाय नहीं, देसी सोच ने दिखाई राह
दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाना हमेशा से चुनौती रहा है. ज्यादातर पशुपालक तुरंत असर के लिए बाजार पर निर्भर हो जाते हैं. लेकिन एक गौशाला प्रबंधन ने अलग सोच अपनाई. उन्होंने खर्च कम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए बाहर की चीजों पर नहीं, बल्कि अपने संसाधनों पर भरोसा किया. दूसरे इलाकों में अपनाई जा रही चारा उत्पादन तकनीकों की जानकारी ली गई और फिर अपनी खाली जमीन का सही इस्तेमाल करने का फैसला किया गया.
खास हरे चारे से बदली हालात
इस प्रयोग के तहत नेपियर और सूडान किस्म के हरे चारे की खेती शुरू की गई. शुरुआत में यह एक सामान्य प्रयास था, लेकिन कुछ ही महीनों में इसके नतीजे सामने आने लगे. पहले जहां रोजाना दूध उत्पादन सीमित था, वहीं हरे चारे के नियमित उपयोग से दूध की मात्रा लगातार बढ़ती चली गई. आज स्थिति यह है कि दूध उत्पादन पहले के मुकाबले लगभग दोगुना हो चुका है, जिससे पशुपालन अब घाटे का नहीं, फायदे का सौदा बन गया है.
दूध ही नहीं, सेहत में भी जबरदस्त सुधार
इस हरे चारे का असर सिर्फ दूध की मात्रा तक सीमित नहीं है. यह चारा पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें फाइबर, प्रोटीन और जरूरी मिनरल अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. इसके सेवन से पशुओं की पाचन शक्ति बेहतर होती है, वे ज्यादा सक्रिय रहते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. सबसे अहम बात यह है कि पशु कम बीमार पड़ते हैं, जिससे दवाइयों और इलाज पर होने वाला खर्च काफी कम हो जाता है.
खेती आसान, लागत बेहद कम
नेपियर-सूडान हरे चारे की खेती भी काफी सरल है. एक बार इसे लगाने के बाद जब पौधा करीब 6 से 8 फीट लंबा हो जाता है, तब इसकी कटाई की जाती है. एक ही पौधे से चार बार तक कटाई संभव होती है. कटाई के बाद इसकी जड़ का कुछ हिस्सा दोबारा रोप दिया जाता है, जिससे फिर से हरा चारा मिलने लगता है. इसका मतलब यह है कि एक बार की मेहनत से लंबे समय तक चारे की व्यवस्था बनी रहती है और बार-बार खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती.
पशुपालकों के लिए बन रही नई मिसाल
कम लागत में लगातार हरा चारा, बढ़ता दूध उत्पादन और घटता इलाज खर्च-इन तीनों फायदों ने इस मॉडल को खास बना दिया है. अब आसपास के इलाकों के पशुपालक भी इस तरीके को अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं. खाली पड़ी जमीन का सही इस्तेमाल करके वे भी अपने पशुओं के लिए पौष्टिक चारा उगा सकते हैं. यह साफ हो गया है कि पशुपालन में तरक्की के लिए हमेशा महंगे उपाय जरूरी नहीं होते. सही जानकारी और देसी तकनीक अपनाकर भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. खास हरे चारे का यह प्रयोग आज उन सभी पशुपालकों के लिए प्रेरणा है, जो कम खर्च में ज्यादा दूध और बेहतर मुनाफा चाहते हैं.