बदलते मौसम में पशुओं पर मंडरा रहा खतरा, ये दो बीमारियां घटा सकती हैं दूध उत्पादन 80 प्रतिशत

बदलते मौसम में पशुओं में कुछ गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है. खुरपका और मुंहपका जैसी बीमारियां पशुओं की सेहत और दूध उत्पादन पर सीधा असर डालती हैं. समय पर पहचान, साफ-सफाई और टीकाकरण से बड़े नुकसान से बचा जा सकता है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 28 Jan, 2026 | 12:24 PM

Animal Husbandry : मौसम का मिजाज बदलते ही इंसानों के साथ-साथ पशुओं की सेहत भी डगमगाने लगती है. खासकर दूध देने वाले पशुओं के लिए यह समय बेहद नाजुक होता है. अगर इस दौरान थोड़ी भी लापरवाही हुई, तो पशु बीमार पड़ सकता है, खाना-पीना छोड़ सकता है और दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है. कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जो देखते-ही-देखते पशुपालकों को बड़ा आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती हैं.

बदलते मौसम में क्यों बढ़ जाता है बीमारी का खतरा

मौसम में उतार-चढ़ाव के कारण पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है. इसी दौरान विषाणु जनित बीमारियां तेजी  से फैलने लगती हैं. इनमें खुरपका और मुंहपका सबसे ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं. अगर समय रहते इन बीमारियों से बचाव नहीं किया गया, तो पशु की सेहत तेजी से गिरने लगती है. दूध उत्पादन कम हो जाता है और कई बार पशु लंबे समय तक बीमार बना रहता है. यही वजह है कि बदलते मौसम में पशुपालकों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होती है.

खुरपका-मुंहपका के लक्षण न करें नजरअंदाज

खुरपका और मुंहपका एक गंभीर वायरल बीमारी है, जो बहुत तेजी से फैलती है. इस बीमारी में पशु को तेज बुखार आ सकता है. मुंह और खुरों  में छाले पड़ जाते हैं, जिससे उसे चलने-फिरने में दर्द होता है और लंगड़ापन आ जाता है. पशु के मुंह से लार टपकने लगती है, भूख कम हो जाती है और वह जुगाली करना बंद कर देता है. कई बार पशु पूरी तरह खाना-पीना छोड़ देता है, जिससे वह कमजोर हो जाता है. इस बीमारी का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि दूध उत्पादन  में 70 से 80 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. अगर पशु गर्भवती हो, तो इस बीमारी के कारण गर्भ गिरने का खतरा भी बना रहता है.

दूध उत्पादन पर सीधा असर, नुकसान हो सकता है बड़ा

खुरपका-मुंहपका की चपेट में आने के बाद पशु की उत्पादन क्षमता  काफी कम हो जाती है. कई मामलों में बीमारी ठीक होने के बाद भी पशु पहले जितना दूध नहीं दे पाता. लगातार कमजोरी के कारण पशु बैठ सकता है या गिर भी सकता है. इससे न सिर्फ इलाज पर खर्च बढ़ता है, बल्कि दूध की आमदनी भी रुक जाती है. छोटे पशुपालकों के लिए यह नुकसान काफी भारी साबित हो सकता है.

बचाव का सबसे मजबूत तरीका है टीकाकरण

खुरपका और मुंहपका से बचाव का सबसे असरदार तरीका नियमित टीकाकरण है. पशुओं को साल में दो बार इस बीमारी का टीका जरूर लगवाना चाहिए. अगर किसी पशु में बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो उसे तुरंत दूसरे पशुओं से अलग कर देना चाहिए, ताकि संक्रमण न फैले. पशुओं के रहने की जगह को साफ-सुथरा रखें और खुर व मुंह की समय-समय पर सफाई करते रहें. अगर लक्षण दिखते ही समय पर इलाज न कराया जाए, तो पशु की जान तक जा सकती है. इसलिए जैसे ही कोई परेशानी नजर आए, तुरंत पशु विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है.

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