Foot and Mouth Disease: मौसम बदलते ही सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि पशु भी बीमारियों की चपेट में आने लगते हैं. खासकर गाय-भैंस पालने वालों के लिए यह समय बेहद संवेदनशील होता है. इस दौर में अगर थोड़ी भी लापरवाही हुई तो पशु खाना-पीना छोड़ सकता है, दूध का उत्पादन तेजी से घट सकता है और नुकसान लाखों में पहुंच सकता है. बदलते मौसम में खुरपका और मुंहपका जैसी बीमारियां सबसे ज्यादा घातक मानी जा रही हैं.
खुरपका-मुंहपका क्यों है इतना खतरनाक
खुरपका और मुंहपका एक विषाणु जनित गंभीर रोग है, जो बहुत तेजी से फैलता है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह बीमारी एक पशु से दूसरे पशु में आसानी से पहुंच जाती है. इस रोग की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि एक बार होने के बाद पशु की दूध देने की क्षमता स्थायी रूप से कम हो सकती है. कई मामलों में दूध उत्पादन 80 प्रतिशत तक गिर जाता है, जिससे पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
बीमारी के लक्षण, ऐसे पहचानें खतरा
खुरपका-मुंहपका के लक्षण साफ नजर आने लगते हैं, लेकिन कई बार पशुपालक इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.
- पशुपालकों के लिए रोजगार का नया मौका, केवल दूध ही नहीं ऊंट के आंसुओं से भी होगी कमाई
- बरसात में खतरनाक बीमारी का कहर, नहीं कराया टीकाकरण तो खत्म हो जाएगा सब
- पशुपालक इन दवाओं का ना करें इस्तेमाल, नहीं तो देना पड़ सकता है भारी जुर्माना
- 2000 रुपये किलो बिकती है यह मछली, तालाब में करें पालन और पाएं भारी लाभ
- पशु को भूख कम लगने लगती है
- जुगाली करना बंद कर देता है
- मुंह और खुर में छाले पड़ जाते हैं
- लार टपकने लगती है
- चलने में परेशानी और लंगड़ापन आ जाता है
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय तक खाना-पीना छोड़ने से पशु कमजोर हो जाता है और गिर भी सकता है. अगर पशु गर्भवती है, तो इस बीमारी की वजह से गर्भपात का खतरा भी रहता है.
दूध और सेहत पर सीधा असर
इस बीमारी का सबसे बड़ा असर दूध उत्पादन पर पड़ता है. जैसे ही पशु बीमार होता है, उसका दूध तेजी से कम होने लगता है. कई मामलों में पशु पूरी तरह दूध देना बंद कर देता है. इसके साथ-साथ पशु की भविष्य की उत्पादन क्षमता भी घट जाती है. यानी बीमारी ठीक होने के बाद भी पशु पहले जितना दूध नहीं दे पाता. यही वजह है कि इसे पशुपालन के लिए सबसे नुकसानदेह रोगों में गिना जाता है.
बचाव ही सबसे बड़ा इलाज
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खुरपका-मुंहपका से पशुओं को बचाने का सबसे मजबूत तरीका नियमित टीकाकरण है. पशुपालकों को अपने पशुओं को साल में दो बार यह टीका जरूर लगवाना चाहिए, ताकि बीमारी का खतरा कम हो सके. अगर कोई पशु बीमार दिखे, तो उसे तुरंत दूसरे पशुओं से अलग रखना जरूरी है. पशुओं के रहने की जगह की नियमित साफ-सफाई करें और उनके खुर व मुंह की समय-समय पर धुलाई करते रहें. शुरुआती लक्षण दिखते ही सही कदम उठा लिए जाएं, तो बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है. लापरवाही करने पर पशु की जान तक जा सकती है, इसलिए किसी भी लक्षण पर तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहद जरूरी है.