भारत के डेयरी और कृषि उत्पाद ईयू एफटीए के दायरे से बाहर, किसान कब बनेंगे प्रतिस्पर्धी? 

अमेरिका से एफटीए नहीं हो पाने के बाद भारत ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है. इनमें खींची गई रेड लाइन का पालन करते हुए भारत ने ईयू के साथ भी डेयरी उत्पादों, गोमांस, चावल और चीनी सहित अन्य कृषि उत्पादों को शुल्क कटौती से बाहर रखा है. जिससे लघु एवं सीमांत किसानों की आजीविका पर कोई आंच न आए.

निर्मल यादव
नोएडा | Published: 29 Jan, 2026 | 06:05 PM
भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर पिछले 18 सालों से चल रही कवायद को आखिरकार मंजिल मिल ही गई. इस समझौते के बाद ईयू के 27 देशों का बाजार भारतीय उत्पादों के लिए खुल जाएगा. इससे पहले यूरोप की बडी आर्थिक ताकत के रूप में ब्रिटेन के साथ भारत ने एफटीए को पिछले साल ही अमलीजामा पहना दिया था. अब ईयू के साथ भी एफटीए पर रजामंदी मिलना, भारत के लिए बडी उपलब्धि है.
भारत सरकार ने भी अपने किसानों की सुरक्षा के लिए डेयरी और प्रमुख कृषि उत्पादों को ईयू के साथ हुए एफटीए से बाहर रखने को इस डील की कामयाबी बताया है. बेशक, इससे भारतीय किसानों के हित फिलहाल सुरक्षित ताे रहेंगे, लेकिन आत्म समीक्षा के लिए यह सवाल जेहन में उठना लाजमी है कि आखिरकार सरकार कब तक अपने किसानों को वैश्विक मानकों की प्रतिस्पर्धा से दूर रखेगी?

जिस मुद्दे से अमेरिका के साथ लटकी थी डील, भारत यूरोपीय को मनाकर साझेदारी की

इस सवाल के जवाब को तलाशने के क्रम में सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि ईयू से पहले भारत ने जिन अन्य देशों के साथ एफटीए किया है, उनमें कृषि उत्पादों का दायरा किस हद तक विस्तृत है. एफटीए की शर्तों के मुताबिक भारत ने ईयू को दूध, पनीर, गोमांस (बीफ), चावल और चीनी सहित कुछ अन्य कृषि उत्पादों को ’रेड लाइन’ श्रेणी में संवेदनशील मानते हुए इन पर टैरिफ में कोई रियायत नहीं दी है. गौरतलब है कि भारत की इसी शर्त के कारण अमेरिका के साथ एफटीए को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका. ईयू के साथ भी एफटीए करते समय भारत की यही कोशिश रही, जिससे यूरोप के सस्ते डेयरी और कृषि उत्पाद भारतीय किसानों के हितों को प्रभावित नहीं कर सकें.

किसानों की आजीविका पर कोई आंच न आए, सरकार ने जतन किए

अमेरिका से एफटीए नहीं हो पाने के बाद भारत ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है. इनमें खींची गई रेड लाइन का पालन करते हुए भारत ने ईयू के साथ भी डेयरी उत्पादों, गोमांस, चावल और चीनी सहित अन्य कृषि उत्पादों को शुल्क कटौती से बाहर रखा है. जिससे लघु एवं सीमांत किसानों की आजीविका पर कोई आंच न आए. इसके जवाब में ईयू ने भी बीफ और चीनी को एफटीए से बाहर रखा है. इससे इतर भारत ने अपने जिन कृषि उत्पादों को ईयू के बाजार तक पहुंच बनाने के लिए एफटीए में शामिल किया है, उनमें चाय, कॉफी, मसाले, मछली और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शामिल है. इन उत्पादों के लिए भारत ने सीमा शुल्क को तर्कसंगत बनाया है. भारत की दलील है कि ये कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में कम टैरिफ पर आयात होने से देश के छोटे किसानों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
न्यूजीलैंड से भी ट्रेड डील होने पर भारत सरकार ने यही रुख अपनाते हुए कहा था कि चावल, गेहूं, डेयरी और सोया सहित अन्य कृषि उत्पाद बहुतायत में देश के छोटे किसान उपजाते हैं. इसलिए इन उत्पादों के आयात से अपने किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिल पाएगी. इसके मद्देनजर भारत सरकार ने अपने किसानों और घरेलू उद्योगों को सुरक्षा देने के लिए अपने बाजार की पहुंच से न्यूजीलैंड के दूध, क्रीम, पनीर और दही जैसे डेयरी उत्पादों, कॉफी, केसीन, प्याज, चीनी, मसाले, खाने के तेल और रबर को दूर रखा है.

न्यूजीलैंड के साथ सौदेबाजी में फायदे के लिए बदलाव

भारत ने अपने सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों (एमएसएमई) से जुडे स्टार्टअप इनोवेटर्स को न्यूजीलैंड में बड़े अवसर दिलाने के उपाय एफटीए में जरूर सुनिश्चित कर लिए. साथ ही भारत ने एफटीए के अंतर्गत सेब, कीवी और शहद के उत्पादन की गुणवत्ता को विश्वस्तरीय बनाने के लिए इन उत्पादों के मामले में न्यूजीलैंड को हासिल महारथ का लाभ भी उठाने के मकसद से तकनीकी हस्तांतरण की साझेदारी की है. इसके फलस्वरूप भारत और न्यूजीलैंड ने सेब, कीवी और शहद के लिए सीमित बाजार पहुंच का मार्ग खोल लिया है. जिससे घरेलू उत्पादकों के लिए सुरक्षा उपायों के साथ नॉलेज ट्रांसफर को समायोजित किया जा सके.
दरअसल भारत ने पहले से ही एक नीतिगत फैसला करके अपने व्यापार समझौतों में थोक डेयरी आयात को लेकर सख्त रुख अपनाया है. डेयरी उत्पाद, भारत के लिए सबसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से अहम रहे है. भारत में करोड़ों की संख्या में छोटे डेयरी किसान हैं, जिनकी आजीविका इसी पर निर्भर है. ऐसे में सरकार इस सेक्टर को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने को प्राथमिकता देती रही है.

वैश्विक मानकों पर खरे नहीं उतर रहे भारतीय डेयरी प्रोडक्ट

इससे इतर न्यूजीलैंड और डेनमार्क सहित अन्य यूरोपीय देश, अपने डेयरी उत्पादों की विश्व स्तरीय गुणवत्ता के लिए मशहूर होने के कारण दुनिया के सबसे बड़े डेयरी निर्यातकों में शामिल है. वहीं, भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है. लेकिन इसके बावजूद दूध और डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता के मामले में वैश्विक मानकों पर खरा नहीं उतर पाने के कारण, भारत अपने डेयरी उत्पादों से घरेलू जरूरतों को ही किसी तरह पूरा कर पाता है. यही वजह है कि भारत को डेयरी क्षेत्र में खुद को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से दूर रखना पड़ता है.

इसी प्रकार ब्रिटेन के साथ हुए एफटीए में भी जिन कृषि उत्पादों पर टैरिफ में छूट को शामिल किया गया है, उनमें चाय, मसाले, कुछ खाद्य पदार्थ और समुद्री उत्पाद शामिल हैं. भारत सरकार का दावा है कि इससे भारतीय निर्यातकों को ब्रिटिश बाजार में अपनी पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा, साथ ही छोटे किसानों के हितों की भी रक्षा हो सकेगी. इस प्रकार भारत के  किसानों में इस बात को लेकर खुशी है कि न्यूजीलैंड से लेकर ब्रिटेन और ईयू के साथ अब तक हुए एफटीए से डेयरी सेक्टर को बाहर रखा गया है. मतलब साफ है कि रेड लाइन में शामिल किए गए भारत के डेयरी एवं कृषि उत्पादों पर टैरिफ की मार नहीं पड़ेगी.

घरेलू उत्पादों को वैश्विक मानक के अनुकूल बनाना जरूरी

इस मामले में सिक्के का एक अन्य पहलू भी है. जिसके मुताबिक भारत की यह रणनीति, किसानों के हितों को सुरक्षित करने का तात्कालिक उपाय जरूर हो सकती है लेकिन यह बेहतर दीर्घकाल उपाय नहीं हो सकती है. समय के साथ यदि अपने कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुकूल नहीं बनाया गया तो भारतीय किसानों की स्थिति ’कूपमंडूक’ वाली ही बनी रहेगी. यह बात देश के दीर्घकालिक आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिहाज से उपयुक्त नहीं मानी जा सकती है. खासकर तब जबकि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया गया हो. ऐसे में मौजूदा रणनीति के बलबूते इस संकल्प को सिद्ध करना दूर की कौड़ी ही साबित होगी.

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