Fertilizer Shortage: रसोई गैस की किल्लत के बीच अब आने वाले समय में खाद की कमी का सामना करना पड़ सकता है. इससे भारत का कृषि क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है. क्योंकि दुनिया के लगभग एक-तिहाई उर्वरक व्यापार पर असर पड़ने की आशंका है. विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक गैस की आपूर्ति कम होने से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि कुछ शोध एजेंसियों का मानना है कि यह संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन भारत के लिए उर्वरकों की आपूर्ति का समय काफी महत्वपूर्ण है.
भारत में उर्वरकों की मांग आमतौर पर मार्च के अंत से अप्रैल के बीच बढ़ने लगती है, क्योंकि मई में मक्का की बुवाई शुरू होती है और यह फसल उर्वरकों पर अधिक निर्भर होती है. इसके अलावा जून से फॉस्फेट उत्पादन का मुख्य मौसम भी शुरू होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया के लगभग 20-30 प्रतिशत उर्वरक निर्यात- जैसे यूरिया, अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर- हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं. अगर यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है, तो खाड़ी क्षेत्र से होने वाला समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है, जिससे ऊर्जा और उर्वरकों की कीमतें बढ़ेंगी और इससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा बढ़ सकता है.
कुछ देशों को निर्यात पर प्रतिबंध लगाने पड़ सकते हैं
विशेषज्ञों के अनुसार बहरीन, ओमान, कतर और सऊदी अरब जैसे देश यूरिया, डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) और अमोनिया जैसे उर्वरकों के बड़े निर्यातक हैं. लेकिन हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण वैश्विक उर्वरक निर्यात पर बड़ा असर पड़ सकता है. शोध एजेंसी BMI के मुताबिक, अगर यह संघर्ष एक महीने से ज्यादा समय तक चलता है तो भारत में उर्वरकों के उपयोग में कमी आ सकती है. इसके साथ ही एल नीनो की संभावना भी बढ़ रही है, जिससे मौसम पहले से ही चुनौतीपूर्ण हो सकता है. ऐसे में उर्वरकों का कम इस्तेमाल होने से फसलों की पैदावार घट सकती है और कुछ देशों को निर्यात पर प्रतिबंध लगाने पड़ सकते हैं.
उर्वरकों के उपयोग पर भी असर पड़ सकता है
भारत जरूरत पड़ने पर रूस से उर्वरकों का आयात बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन अगर यह संकट तीन महीने से ज्यादा चलता है तो कमी को पूरा करना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी स्थिति में किसानों को उर्वरकों का उपयोग कम करना पड़ सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार इस संघर्ष का असर खेती पर भी पड़ सकता है. International Food Policy Research Institute के विशेषज्ञ जोसेफ ग्लॉबर ने बिजनेसलाइन से कहा कि इसका प्रभाव दक्षिणी गोलार्ध में बुवाई के फैसलों और पैदावार पर पड़ सकता है. साथ ही दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में धान की खेती के लिए उर्वरकों के उपयोग पर भी असर पड़ सकता है.
एक ही हफ्ते में यूरिया की कीमत करीब 19 प्रतिशत बढ़ गई
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही कम होने के कारण वैश्विक उर्वरक कीमतें बढ़ने लगी हैं. प्राकृतिक गैस की आपूर्ति घटने से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है, जबकि फारस की खाड़ी से उर्वरकों का निर्यात तेजी से कम हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध और चीन के निर्यात प्रतिबंधों के बाद कई देशों ने उर्वरकों के लिए खाड़ी क्षेत्र पर ज्यादा निर्भरता बढ़ा दी थी. लेकिन दुनिया के लगभग एक-चौथाई उर्वरक उत्पादन का परिवहन इसी जलडमरूमध्य से होता है, इसलिए कीमतों में तेजी आ गई है. मध्य पूर्व में एक ही हफ्ते में यूरिया की कीमत करीब 19 प्रतिशत बढ़ गई है, जिससे दुनिया भर के कृषि क्षेत्रों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है.
नाइट्रोजन मिश्रण और फॉस्फेट उत्पादन के लिए बहुत जरूरी
शोध एजेंसी BMI के अनुसार सल्फर नाइट्रोजन मिश्रण और फॉस्फेट उत्पादन के लिए बहुत जरूरी है. इसकी आपूर्ति में रुकावट से वैश्विक उर्वरक उद्योग पर असर पड़ सकता है, हालांकि इसका प्रभाव सीमित रहने की संभावना है. रिसर्च एजेंसी BMI के अनुसार 2 से 11 मार्च के बीच अमेरिका के गल्फ क्षेत्र में ग्रैन्युलर यूरिया की कीमतों में लगभग 15.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वहीं विशेषज्ञों के मुताबिक 5 मार्च को मध्य पूर्व में यूरिया की कीमत 590 डॉलर प्रति टन से अधिक पहुंच गई, जो एक हफ्ते पहले की तुलना में लगभग 90 डॉलर ज्यादा है. इसी तरह अमेरिका के गल्फ क्षेत्र में DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की कीमत 655 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई, जो करीब 5 फीसदी अधिक है.