सर्दी में कश्मीर से बर्फ गायब, तापमान बढ़ने से सेब किसानों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

कश्मीर में सेब की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की रोजी-रोटी है. छोटे और सीमांत किसान पूरी तरह इसी आमदनी पर निर्भर होते हैं. ऐसे में अगर उत्पादन घटता है या फल की गुणवत्ता खराब होती है, तो इसका असर सीधे उनकी जिंदगी पर पड़ेगा.

नई दिल्ली | Published: 19 Jan, 2026 | 12:53 PM

कश्मीर घाटी में सर्दियों का मौसम हमेशा से सेब की खेती के लिए सबसे अहम माना जाता रहा है. बर्फ से ढकी वादियां, लंबे समय तक ठंड और धीरे-धीरे पिघलती बर्फ, यही वह प्राकृतिक चक्र है, जिस पर कश्मीर का सेब उत्पादन टिका होता है. लेकिन इस साल सर्दी कुछ अलग ही रंग दिखा रही है. लंबे समय से बर्फबारी नहीं हुई है, तापमान सामान्य से ज्यादा बना हुआ है और इसी वजह से सेब बागानों में एक अजीब सी बेचैनी फैल गई है.

बर्फ नहीं गिरी, मौसम ने बदला मिजाज

ग्रेटर कश्मीर की रिपोर्ट के अमुसार, उत्तर और दक्षिण कश्मीर के सेब उत्पादक इलाकों में किसान कहते हैं कि उन्होंने ऐसी सर्दी पहले कभी नहीं देखी. आमतौर पर दिसंबर और जनवरी में अच्छी बर्फबारी हो जाती है, जिससे बागानों में पेड़ गहरी नींद यानी सुप्त अवस्था में चले जाते हैं. लेकिन इस बार सूखी सर्दी ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बिगाड़ दिया है. दिन का तापमान बढ़ रहा है और मौसम कई बार शुरुआती बसंत जैसा महसूस हो रहा है.

सेब के पेड़ों की नींद टूटने का खतरा

विशेषज्ञों के मुताबिक, सेब के पेड़ों को सर्दियों में एक तय समय तक ठंड चाहिए होती है, जिसे “चिलिंग आवर्स” कहा जाता है. यही ठंड बाद में एकसमान फूल और अच्छे फल बनने में मदद करती है. अगर यह संतुलन बिगड़ता है, तो पेड़ समय से पहले कली निकाल सकते हैं.

शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर वसीम अली का कहना है कि अगर दिन का तापमान इसी तरह ऊंचा बना रहा, तो सेब के पेड़ों में समय से पहले फूल आ सकते हैं. इसके बाद अगर अप्रैल में अचानक बारिश या देर से बर्फबारी हो गई, तो फूलों को भारी नुकसान हो सकता है, जिसका सीधा असर फल बनने और कुल उत्पादन पर पड़ेगा.

सिर्फ फूल ही नहीं, पानी भी बन रहा चिंता का कारण

बर्फबारी सिर्फ ठंड के लिए ही जरूरी नहीं होती, बल्कि यह प्राकृतिक जल भंडार का काम भी करती है. बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर जमीन में नमी बनाए रखती है और भूजल स्तर को भी मजबूत करती है. इस साल बर्फ न गिरने से किसानों को डर है कि गर्मियों में मिट्टी में नमी की कमी हो सकती है. इसका असर फल के आकार, गुणवत्ता और मिठास तक पर पड़ सकता है.

बागानों में दिखने लगे असर

शोपियां, बारामुला, अनंतनाग, पुलवामा और कुलगाम जैसे सेब उत्पादक जिलों के किसान बताते हैं कि मौसम का असर अब दिखने लगा है. शोपियां के बागवान तारिक अहमद मीर कहते हैं कि आमतौर पर मार्च तक बागान शांत रहते हैं, लेकिन इस बार मौसम जल्दी बदल रहा है. अगर कलियां समय से पहले खुल गईं और बाद में ठंडी बारिश आ गई, तो पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता है.

छोटे किसानों के लिए सबसे बड़ा खतरा

कश्मीर में सेब की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की रोजी-रोटी है. छोटे और सीमांत किसान पूरी तरह इसी आमदनी पर निर्भर होते हैं. ऐसे में अगर उत्पादन घटता है या फल की गुणवत्ता खराब होती है, तो इसका असर सीधे उनकी जिंदगी पर पड़ेगा. पुलवामा के फल व्यापारी मोहम्मद रफी बताते हैं कि सेब उद्योग कश्मीर की अर्थव्यवस्था में करीब 8 प्रतिशत का योगदान देता है. इसमें थोड़ी सी भी बड़ी गिरावट पूरे इलाके को आर्थिक झटका दे सकती है.

भविष्य को लेकर बढ़ती जलवायु चिंता

किसान और विशेषज्ञ दोनों मानते हैं कि यह सिर्फ एक साल की समस्या नहीं हो सकती. जलवायु में हो रहे बदलाव धीरे-धीरे कश्मीर की पारंपरिक खेती को चुनौती दे रहे हैं. मौसम का असंतुलन, अनियमित बर्फबारी और बढ़ता तापमान आने वाले वर्षों में सेब उत्पादन के लिए बड़ा खतरा बन सकता है.

उम्मीद अभी बाकी है

हालांकि किसान अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि फरवरी या मार्च में मौसम अपना पुराना रूप दिखाएगा और बर्फबारी से कुछ संतुलन बनेगा. लेकिन इस सूखी सर्दी ने यह साफ कर दिया है कि कश्मीर के बागानों में जलवायु चिंता अब सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक सच्चाई बनती जा रही है. अगर समय रहते समाधान और अनुकूलन के रास्ते नहीं खोजे गए, तो कश्मीर का सेब, जो घाटी की पहचान है, आने वाले समय में बड़ी चुनौती का सामना कर सकता है.

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