Economic Survey 2025-26: किसानों की आमदनी से लेकर गांवों की हालत तक, जानिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हाल

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में जब यह समीक्षा पेश की, तो साफ कहा कि खेती अब सिर्फ गुजारे का साधन नहीं रही, बल्कि यह विकसित भारत के सपने का मजबूत आधार बन रही है. यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह उस बदलाव की कहानी है, जो खेत से लेकर बाजार और किसान की जेब तक दिखने लगा है.

नई दिल्ली | Updated On: 29 Jan, 2026 | 02:26 PM

अगर कोई आज यह पूछे कि भारतीय खेती किस दिशा में जा रही है, तो इसका सबसे साफ जवाब आर्थिक समीक्षा 2025-26 में मिलता है. यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह उस बदलाव की कहानी है, जो खेत से लेकर बाजार और किसान की जेब तक दिखने लगा है. बीज की गुणवत्ता से लेकर सिंचाई, मशीनीकरण, बाजार, बीमा और कर्ज तक हर मोर्चे पर खेती धीरे-धीरे मजबूत होती नजर आ रही है.

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में जब यह समीक्षा पेश की, तो साफ कहा कि खेती अब सिर्फ गुजारे का साधन नहीं रही, बल्कि यह विकसित भारत के सपने का मजबूत आधार बन रही है.

बीज से शुरू हुई खेती की मजबूती

खेती की असली शुरुआत बीज से होती है. अगर बीज अच्छा है, तो फसल भी अच्छी होगी, यह बात किसान सदियों से जानते हैं. इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने बीज और रोपण सामग्री उप-मिशन शुरू किया. इसका असर यह हुआ कि देशभर में 6.85 लाख बीज गांव बनाए गए, जहां किसानों को सीधे अच्छी किस्म के बीज मिलने लगे.

अब तक 1,649 लाख क्विंटल से ज्यादा गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार किए जा चुके हैं और करीब 2.85 करोड़ किसान इससे लाभान्वित हुए हैं. यही नहीं, बजट 2025-26 में उच्च उत्पादकता वाले बीजों के लिए राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की गई है, ताकि आने वाले समय में जलवायु बदलाव को झेल सकने वाली नई किस्में किसानों तक पहुंच सकें.

पानी पहुंचा खेत तक, बढ़ी सिंचाई की पकड़

खेती में पानी का महत्व किसी से छिपा नहीं है. जहां पानी समय पर मिला, वहां किसान का भरोसा भी बढ़ा. आर्थिक समीक्षा बताती है कि साल 2001-02 में जहां देश का सिर्फ 41.7 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित था, वहीं 2022-23 तक यह बढ़कर 55.8 प्रतिशत हो गया है.

ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा मिला. छोटे किसानों को 55 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी गई. इसका नतीजा यह हुआ कि अब किसान कम पानी में ज्यादा उत्पादन कर पा रहे हैं और फसल विविधीकरण भी आसान हुआ है.

मिट्टी की सेहत पर सरकार की नजर

खेती की जमीन अगर कमजोर हो जाए, तो उत्पादन भी गिरता है. इसे समझते हुए मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना को मजबूत किया गया. अब तक 25.55 करोड़ से ज्यादा मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों को दिए जा चुके हैं.

इन कार्डों से किसान जान पा रहे हैं कि उनकी जमीन में किस पोषक तत्व की कमी है और कितनी खाद डालनी चाहिए. नीम कोटेड यूरिया, आधार लिंक व्यवस्था और उर्वरक प्रबंधन में पारदर्शिता ने लागत घटाई और मिट्टी की सेहत सुधारी.

मशीनें आईं, मेहनत हुई आसान

पहले जहां खेती पूरी तरह हाथ और बैलों पर निर्भर थी, आज मशीनों ने किसान की मेहनत हल्की कर दी है. कृषि मशीनीकरण उप-मिशन के तहत देशभर में 25 हजार से ज्यादा कस्टम हायरिंग सेंटर बनाए गए हैं.

इन सेंटरों से किसान ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और अन्य उपकरण किराए पर ले सकते हैं. इससे छोटे किसानों को भी आधुनिक खेती का फायदा मिलने लगा है.

भंडारण और बाजार तक सीधी पहुंच

खेती में नुकसान सिर्फ खेत में नहीं होता, बाजार तक पहुंचने में भी होता है. इसे देखते हुए सरकार ने भंडारण और विपणन अवसंरचना पर जोर दिया. अब तक 49,000 से ज्यादा भंडारण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है.

ई-नाम प्लेटफॉर्म ने किसानों को एक डिजिटल बाजार दिया. आज इस पर 1.79 करोड़ किसान और 2.72 करोड़ व्यापारी जुड़े हुए हैं. किसान अब अपनी उपज का सही दाम देख और तय कर पा रहे हैं.

MSP और पीएम-किसान से मिली आय को स्थिरता

खेती में सबसे बड़ी चिंता आय की अनिश्चितता होती है. मौसम खराब हो जाए या बाजार गिर जाए किसान परेशान हो जाता है. MSP और पीएम-किसान जैसी योजनाओं ने इस चिंता को काफी हद तक कम किया है.

पीएम-किसान के तहत अब तक 11 करोड़ किसानों को 4.09 लाख करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं. यह पैसा सीधे खाते में पहुंचा, जिससे किसान बीज, खाद और घरेलू जरूरतें पूरी कर सके.

कर्ज हुआ आसान, भरोसा बढ़ा

खेती के लिए कर्ज जरूरी है, लेकिन सही समय पर कर्ज मिलना उससे भी जरूरी है. वित्त वर्ष 2025 में 28.69 लाख करोड़ रुपये का कृषि ऋण दिया गया, जो लक्ष्य से ज्यादा है.

किसान क्रेडिट कार्ड योजना से 7.72 करोड़ किसान जुड़े हुए हैं. समय पर कर्ज चुकाने वालों को ब्याज में अतिरिक्त छूट दी जा रही है, जिससे किसान साहूकारों पर निर्भर नहीं रहे.

फसल बीमा बना संकट में ढाल

बारिश, ओलावृष्टि या कीट कुछ भी फसल खराब कर सकता है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने ऐसे समय में किसानों को सहारा दिया. 2024-25 में 4.19 करोड़ किसानों को बीमा का लाभ मिला, जो पहले से कहीं ज्यादा है.

बागवानी और पशुपालन से बढ़ी आमदनी

खेती अब सिर्फ गेहूं-धान तक सीमित नहीं है. बागवानी, डेयरी और मत्स्य पालन ने गांव की अर्थव्यवस्था को नई ताकत दी है. बागवानी का उत्पादन बढ़कर 367 मिलियन टन तक पहुंच गया है,साल 2013-14 में जहां बागवानी उत्पादन करीब 280 मिलियन टन था और यह कृषि जीवीए का 33 प्रतिशत हिस्सा बन चुका है. इसी के साथ भारत अब दुनिया में प्याज का सबसे बड़ा उत्पादक है और फल-सब्जी में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है.

वहीं वित्तीय वर्ष 2015 से 2024 के बीच पशुधन यानी गाय-भैंस, दूध और पशुपालन से जुड़े कामों में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है. इस दौरान इस क्षेत्र की कमाई लगभग तीन गुना बढ़ी है. मौजूदा दामों पर देखें तो हर साल औसतन करीब 12.7 प्रतिशत की रफ्तार से इसमें बढ़त हुई है. वहीं, मत्स्य पालन यानी मछली उत्पादन ने भी शानदार प्रदर्शन किया है. साल 2004 से 2014 की तुलना में 2014 से 2025 के बीच मछली उत्पादन में 140 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, यानी करीब 88 लाख टन मछली का इजाफा हुआ. साफ है कि पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे सहयोगी क्षेत्र अब खेती के साथ मिलकर किसानों की आय बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहे हैं.

विकसित भारत की राह में खेती की बड़ी भूमिका

आर्थिक समीक्षा साफ कहती है कि खेती और उससे जुड़े क्षेत्र आने वाले समय में भारत की रीढ़ बने रहेंगे. बीज, पानी, मशीन, बाजार, बीमा और कर्ज हर कड़ी मजबूत हो रही है.

Published: 29 Jan, 2026 | 02:22 PM

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