अब खेतों में खुद चलेंगे ट्रैक्टर, कम मेहनत में होगी ज्यादा पैदावार, किसानों के लिए आई नई कमाल की टेक्नोलॉजी

GPS तकनीक का सबसे बड़ा फायदा तब सामने आता है जब इसे ऑटो-स्टीयरिंग सिस्टम के साथ जोड़ा जाता है. इस व्यवस्था में ट्रैक्टर खुद-ब-खुद तय की गई लाइनों पर चलता है. किसान को हर समय स्टीयरिंग पकड़कर बैठने की जरूरत नहीं होती, जिससे थकान कम होती है. लंबे समय तक काम करने पर भी बुवाई और जुताई में कोई टेढ़ापन नहीं आता.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 23 Jan, 2026 | 08:39 AM

GPS farming: आज का किसान अब सिर्फ परंपरागत तरीकों तक सीमित नहीं रहा. बदलते समय के साथ वह नई तकनीकों को अपना रहा है, ताकि मेहनत कम हो और आमदनी ज्यादा हो. इसी कड़ी में खेती में GPS तकनीक एक बड़ा बदलाव लेकर आई है. जैसे मोबाइल फोन में GPS हमें सही रास्ता दिखाता है, वैसे ही खेतों में यह तकनीक किसानों को सटीक खेती करने में मदद कर रही है. GPS आधारित खेती से न सिर्फ समय और संसाधनों की बचत हो रही है, बल्कि फसल की पैदावार और गुणवत्ता में भी साफ सुधार देखने को मिल रहा है.

GPS तकनीक खेती में कैसे काम करती है

GPS यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम उपग्रहों से संकेत लेकर जमीन पर मौजूद मशीनों की सटीक लोकेशन बताता है. खेती में जब ट्रैक्टर, सीड ड्रिल, स्प्रे मशीन या हार्वेस्टर को GPS से जोड़ा जाता है, तो ये मशीनें तय रास्ते पर बिल्कुल सीधी और संतुलित चलती हैं. खेत में कहां जुताई हुई, कहां बुवाई बाकी है या कहां दोबारा खाद डाली गई है, यह सारी जानकारी डिजिटल रूप से रिकॉर्ड हो जाती है. इससे अनुमान के बजाय सटीक योजना के आधार पर खेती संभव हो पाती है.

ऑटो-स्टीयरिंग से आसान हुई खेती

GPS तकनीक का सबसे बड़ा फायदा तब सामने आता है जब इसे ऑटो-स्टीयरिंग सिस्टम के साथ जोड़ा जाता है. इस व्यवस्था में ट्रैक्टर खुद-ब-खुद तय की गई लाइनों पर चलता है. किसान को हर समय स्टीयरिंग पकड़कर बैठने की जरूरत नहीं होती, जिससे थकान कम होती है. लंबे समय तक काम करने पर भी बुवाई और जुताई में कोई टेढ़ापन नहीं आता. खास बात यह है कि रात के समय या हल्के कोहरे में भी खेती का काम बिना रुकावट किया जा सकता है.

डेटा आधारित फैसलों से बढ़ी समझदारी

GPS जब खेतों में लगे सेंसर और स्मार्ट उपकरणों से जुड़ता है, तो किसान को मिट्टी की नमी, पोषक तत्वों की स्थिति, फसल की बढ़वार और पैदावार से जुड़ा पूरा डेटा मिल जाता है. इस जानकारी के आधार पर किसान यह तय कर पाता है कि कहां ज्यादा खाद की जरूरत है और कहां कम. इससे अंधाधुंध खाद और कीटनाशक डालने की प्रवृत्ति खत्म होती है और खेती ज्यादा संतुलित बनती है.

बीज, खाद और पानी की सटीक खपत

GPS तकनीक की मदद से बीज और खाद बिल्कुल सही दूरी और मात्रा में डाली जाती है. इससे बीजों की बर्बादी रुकती है और हर पौधे को समान पोषण मिलता है. सिंचाई में भी GPS आधारित सिस्टम यह तय करने में मदद करता है कि खेत के किस हिस्से में कितना पानी देना है. इससे पानी की बचत होती है और फसल को जरूरत के मुताबिक नमी मिलती है.

लागत कम, मुनाफा ज्यादा

GPS से खेती करने पर ट्रैक्टर के अनावश्यक चक्कर कम हो जाते हैं. इससे डीजल की खपत घटती है और मशीनों पर भी कम दबाव पड़ता है. समय पर मशीनों की स्थिति का पता चलने से मरम्मत भी पहले हो जाती है, जिससे बड़े नुकसान से बचाव होता है. शुरुआती स्तर पर GPS सिस्टम लगाने में थोड़ा खर्च जरूर आता है, लेकिन लंबे समय में यही तकनीक किसानों की लागत घटाकर मुनाफा बढ़ाने में मदद करती है.

फार्म प्लानिंग और भविष्य की खेती

GPS तकनीक से खेतों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर हर हिस्से की अलग देखभाल की जा सकती है. इससे किसान यह समझ पाता है कि किस जमीन से कितनी पैदावार मिल रही है और कहां सुधार की जरूरत है. आने वाले समय में यही तकनीक खेती को और स्मार्ट बनाएगी, जहां हर फैसला आंकड़ों और तकनीक के आधार पर लिया जाएगा.

GPS आधारित खेती आज के किसानों के लिए एक मजबूत सहारा बन चुकी है. यह तकनीक न सिर्फ मेहनत को आसान बनाती है, बल्कि खेती को एक फायदे का सौदा भी बनाती है. जो किसान समय रहते इसे अपनाते हैं, वही आने वाले दौर की स्मार्ट खेती में आगे रहेंगे.

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