El Nino 2026: देश में इस साल अल नीनो (El Nino) के असर की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार और कृषि वैज्ञानिकों ने तैयारियां तेज कर दी हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने पिछले सूखा प्रभावित अल नीनो सालों के आंकड़ों का अध्ययन कर उन जिलों की पहचान की है, जहां बारिश कम होने पर फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है. इसका मकसद समय रहते किसानों को बचाव के उपाय बताना और उत्पादन में गिरावट को कम करना है.
पुराने आंकड़ों के आधार पर तैयार हुई योजना
आईसीएआर ने 2002, 2004 और 2009 जैसे उन सालों का अध्ययन किया, जब अल नीनो की वजह से देश के कई हिस्सों में बारिश कम हुई थी और फसलों को नुकसान हुआ था. इस दौरान उन जिलों की पहचान की गई, जहां कम बारिश के कारण फसल उत्पादन में 10 फीसदी या उससे ज्यादा गिरावट आई थी. इसी जानकारी के आधार पर एक खास नक्शा तैयार किया गया है, जिससे पहले से पता लगाया जा सके कि कम बारिश होने पर कौन-कौन से इलाके खेती के लिहाज से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. इससे किसानों और प्रशासन को समय रहते तैयारी करने में मदद मिलेगी.
किन फसलों पर सबसे ज्यादा खतरा?
आईसीएआर के मुताबिक, अल नीनो के दौरान सबसे अधिक जोखिम वर्षा आधारित खेती वाली फसलों को होता है.
- धान के 77 जिले संवेदनशील पाए गए हैं.
- मक्का के 65 जिले जोखिम वाले माने गए हैं.
- ज्वार के 36 जिले प्रभावित हो सकते हैं.
- बाजरा के 36 जिले भी खतरे की श्रेणी में रखे गए हैं.
इन जिलों में बारिश की कमी होने पर उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है.
2002, 2004 और 2009 जैसे हालात नहीं
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, 2002, 2004 और 2009 ऐसे साल रहे जब अल नीनो का मॉनसून पर बड़ा असर देखने को मिला. इन वर्षों में बारिश सामान्य से काफी कम रही, जिसका सीधा असर खेती और खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ा. नतीजतन देश के खाद्यान्न उत्पादन में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई थी.
| साल | बारिश में कमी | खाद्यान्न उत्पादन पर असर |
|---|---|---|
| 2002 | सामान्य से 19 फीसदी कम बारिश | उत्पादन में 22 फीसदी से अधिक गिरावट |
| 2004 | 13 फीसदी कम बारिश | उत्पादन में करीब 12 फीसदी की कमी |
| 2009 | 23 फीसदी कम बारिश | उत्पादन में लगभग 12 फीसदी की कमी |
तीनों सालों में अल नीनो के कारण कमजोर मॉनसून का असर खरीफ फसलों पर साफ तौर पर देखा गया.
हालांकि कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि, 2026 की स्थिति उन वर्षों जैसी नहीं है. पिछले कुछ सालों में सिंचाई सुविधाओं का काफी विस्तार हुआ है, खासकर भूजल आधारित सिंचाई बढ़ी है. इसलिए कम बारिश का असर पहले की तुलना में कुछ हद तक कम हो सकता है.
सूखे की स्थिति में क्या होगी रणनीति?
आईसीएआर की 2026 की कार्ययोजना के मुताबिक, अगर कम बारिश की वजह से फसलों पर सूखे का असर बढ़ने लगता है, तो कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) किसानों को जरूरत के समय फसलों में पानी देने की सलाह देंगे. इसका मकसद फसलों को सूखने से बचाना और नुकसान को कम करना है, ताकि किसानों की पैदावार पर ज्यादा असर न पड़े.
इसके अलावा:
- पत्तियों पर पोषक तत्वों का छिड़काव किया जाएगा.
- फसल खराब होने की स्थिति में वैकल्पिक फसलें लगाने की सलाह दी जाएगी.
- ज्यादा प्रभावित फसलों को पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करने का सुझाव भी दिया जा सकता है.
राज्यों के साथ लगातार बैठकें
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हैदराबाद स्थित आईसीएआर के केंद्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (CRIDA) ने कई राज्यों के कृषि विभागों के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों को संभावित जोखिम और बचाव की रणनीतियों के बारे में जानकारी दी जा रही है.
खरीफ सीजन के लिए सरकार ने रखा बड़ा उत्पादन लक्ष्य
केंद्र सरकार ने मौजूदा खरीफ सीजन में 17.61 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा धान का है, जिसका उत्पादन लक्ष्य 12.31 करोड़ टन रखा गया है.
- इसके अलावा मक्का का लक्ष्य 3.10 करोड़ टन
- मोटे अनाज (श्री अन्न) का 1.35 करोड़ टन
- दलहन का 84 लाख टन निर्धारित किया गया है.
वहीं मौसम विभाग के अनुसार, 1 जून से 24 जून के बीच देशभर में हुई बारिश सामान्य से करीब 42 फीसदी कम रही है. आंकड़ों के मुताबिक, देश के केवल 21 फीसदी क्षेत्र में ही सामान्य स्तर की बारिश दर्ज की गई है. कम बारिश की वजह से कई इलाकों में खेती-किसानी की चिंता बढ़ गई है.