FSSAI new food safety rules: देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. अब बेसन, खाद्य तेल, मछली उत्पाद, झींगा, प्रॉन और बीजों से बने तेलों के लिए नए और अधिक सख्त सुरक्षा मानक लागू किए जा रहे हैं. इन नियमों का मुख्य उद्देश्य लोगों को मिलावटी, दूषित और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों से बचाना है.
आजकल पैकेज्ड खाद्य पदार्थों और प्रोसेस्ड फूड का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में खाद्य सुरक्षा के नियमों को और मजबूत बनाना समय की जरूरत बन गया है. इसी को ध्यान में रखते हुए FSSAI ने कई पुराने मानकों में बदलाव किए हैं और कुछ नए नियमों का मसौदा भी जारी किया है.
बेसन और दालों से बने उत्पादों पर बढ़ेगी निगरानी
अब तक दालों में मौजूद भारी धातुओं की जांच की जाती थी, लेकिन नए नियमों के तहत यह निगरानी दालों से बने उत्पादों तक भी बढ़ा दी गई है. इसमें बेसन और विभिन्न प्रकार के पैकेज्ड मिक्स शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल घरों और खाद्य उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जाता है.
FSSAI ने सीसा (Lead) और कैडमियम (Cadmium) जैसे हानिकारक तत्वों के लिए अधिक सख्त मानक तय किए हैं. ये दोनों धातुएं लंबे समय तक शरीर में पहुंचने पर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती हैं. इसलिए अब इनकी मात्रा पर पहले से ज्यादा नजर रखी जाएगी. ये नए नियम 1 दिसंबर 2026 से लागू होंगे.
खाद्य तेलों में भी सख्ती
TOI की खबर के अनुसार, खाद्य तेलों की गुणवत्ता को लेकर भी नए बदलाव किए गए हैं. FSSAI ने तेल और तिलहन उत्पादों में अफ्लाटॉक्सिन (Aflatoxin) की सीमा को लेकर नियमों में संशोधन किया है. अफ्लाटॉक्सिन एक जहरीला पदार्थ होता है जो कुछ प्रकार की फफूंद से पैदा होता है और लंबे समय तक इसके सेवन से स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है.
इसके अलावा मछली के तेलों में आर्सेनिक की जांच से जुड़े मानकों को भी अपडेट किया गया है. वहीं जायफल और जावित्री से बने खाद्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों में पाए जाने वाले प्राकृतिक तत्व सैफरोल (Safrole) के लिए भी नए मानक तय किए गए हैं.
झींगा और मछली उत्पादों पर रहेगा खास ध्यान
समुद्री खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत को देखते हुए FSSAI ने सीफूड के लिए भी नए नियम लागू किए हैं. अब झींगा, प्रॉन और अन्य मछली उत्पादों में एंटीबायोटिक अवशेषों की सीमा तय की गई है.
ट्राइमेथोप्रिम और ऑक्सोलिनिक एसिड जैसे एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी पर विशेष निगरानी रखी जाएगी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लंबे समय तक ऐसे अवशेष शरीर में पहुंचते रहें तो दवाओं का असर कम हो सकता है और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी गंभीर समस्या पैदा हो सकती है. इसके अलावा कुछ लोगों में एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.
नए प्रकार के बीजों के तेलों के लिए भी नियम
हाल के वर्षों में कोल्ड-प्रेस्ड और विशेष बीजों से बने तेलों की मांग तेजी से बढ़ी है. बाजार में टमाटर, मिर्च, खरबूजा और भिंडी के बीजों से बने तेल भी उपलब्ध होने लगे हैं.
इसी को देखते हुए FSSAI ने इन उत्पादों के लिए भी गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का मसौदा तैयार किया है. प्रस्तावित नियमों के अनुसार इन तेलों में मिलावट, खतरनाक अशुद्धियां, खराब गुणवत्ता और मिनरल ऑयल जैसी मिलावट नहीं होनी चाहिए. साथ ही इनमें नमी, अम्लता और धातुओं की मात्रा के लिए भी स्पष्ट सीमाएं निर्धारित की जाएंगी.
खाने वाले बीजों की गुणवत्ता पर भी फोकस
नए मसौदे में तरबूज, खीरा, कद्दू, सूरजमुखी, तिल और अलसी जैसे खाद्य बीजों को भी शामिल किया गया है. बाजार में बिकने वाले कच्चे, भुने या नमकीन बीजों को साफ-सुथरा और सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा.
इन उत्पादों में कीड़े, फफूंद या किसी प्रकार का दिखाई देने वाला दूषण नहीं होना चाहिए. इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं तक बेहतर गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पाद पहुंचाना है.
उपभोक्ताओं की सेहत होगी अधिक सुरक्षित
विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य सुरक्षा मानकों को मजबूत करने से लोगों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी. लगातार दूषित या मिलावटी खाद्य पदार्थों के सेवन से किडनी की बीमारी, तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याएं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
FSSAI ने नए मसौदा नियमों पर जनता से 60 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं. इसके बाद अंतिम नियम जारी किए जाएंगे. माना जा रहा है कि ये बदलाव भारत में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाएंगे तथा उपभोक्ताओं को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.