गॉडजिला अल नीनो से भारत में बढ़ा खतरा, कमजोर मॉनसून और खेती पर मंडराया बड़ा संकट
प्रशांत महासागर में बन रहा गॉडजिला अल नीनो 2026 के मॉनसून को प्रभावित कर सकता है. इससे बारिश में भारी कमी, कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ की स्थिति बन सकती है. खेती, तापमान और जल स्रोतों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, जिससे किसानों और अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
Godzilla El Nino: प्रशांत महासागर में बन रहा गॉडजिला अल नीनो 2026 के मॉनसून के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र की मौसम संस्था, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, इस साल के मध्य तक बहुत ही शक्तिशाली अल नीनो बनने की संभावना 80 से 90 फीसदी तक है. अगर ऐसा हुआ, तो यह दुनिया भर के मौसम पर बुरा असर डाल सकता है. भारत में इसका सीधा प्रभाव बारिश, तापमान, खेती और जल संसाधनों पर देखने को मिल सकता है. अगर यह स्थिति मजबूत होती है, तो कहीं सूखा और कहीं अचानक भारी बारिश जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं, जिससे कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ेगा.
गॉडजिला अल नीनो क्या है और क्यों बढ़ी चिंता
El Niño प्रशांत महासागर में होने वाली एक जलवायु घटना है, जिसमें समुद्र के तापमान और हवाओं में बदलाव आता है. सामान्य स्थिति में पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली हवाएं गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती हैं, जिससे भारत में मानसून मजबूत रहता है. लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो गर्म पानी वापस मध्य और पूर्वी प्रशांत की ओर चला जाता है. इसी स्थिति को अल नीनो कहा जाता है. नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के एक वैज्ञानिक बिल पैटजर्ट ने समुद्र की बेकाबू गर्मी को देखकर पहली बार गॉडजिला अल नीनो शब्द का इस्तेमाल किया था. जब ये असामान्य रूप से ज्यादा मजबूत हो जाता है, तो इसे सुपर अल नीनो या गॉडजिला अल नीनो कहा जाता है. इस बार प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ती गर्मी और कमजोर होती हवाओं को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इसे लेकर चिंता जताई है.
भारत के मॉनसून पर असर
मौसम विशेषज्ञ एस.एन पांडे (S.N. Pandey) के अनुसार, अगर ये शक्तिशाली अल नीनो विकसित होता है तो भारत के 2026 मॉनसून पर गंभीर असर पड़ सकता है. बारिश में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है, जिससे कई राज्यों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं. वहीं कुछ क्षेत्रों में अचानक तेज बारिश और बाढ़ की स्थिति भी बन सकती है. इसका असर सीधे जल स्रोतों, नदियों और भूजल स्तर पर पड़ेगा. ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की समस्या भी बढ़ सकती है. कमजोर मानसून कृषि चक्र को पूरी तरह प्रभावित कर सकता है.
- PM Kisan Yojana के लाभार्थियों को एडवांस में मिलेंगे 2000 रुपये, जानिए किस्त जारी करने के लिए मंत्रालय ने क्या कहा
- हल्दी, करौंदा की खेती पर सरकार दे रही 10 हजार रुपये, स्प्रिंकलर लगवाने पर 90 फीसदी सब्सिडी पाएं किसान
- यमुना और हिंडन की बाढ़ में अभी भी डूबे दर्जनों गांव, गन्ना में बीमारी लग रही.. गेहूं बुवाई में देरी की चिंता
खेती और किसानों पर बड़ा संकट
भारत की करीब आधी खेती मानसून पर निर्भर है. ऐसे में कमजोर बारिश किसानों के लिए बड़ा संकट बन सकती है. धान, दाल, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी प्रमुख फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं. बारिश कम होने पर बुआई में देरी होगी और कई जगह फसलें खराब हो सकती हैं. उत्पादन घटने से किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा. बाजार में अनाज की कमी होने से दाल और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई का दबाव आम लोगों की जेब पर पड़ेगा.
बिजली, गर्मी और वैश्विक असर
कमजोर मॉनसून का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा. जलाशयों में पानी कम होने से हाइड्रो पावर उत्पादन घट सकता है. दूसरी तरफ गर्मी और उमस बढ़ने से बिजली की मांग तेजी से बढ़ेगी, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है. वैश्विक स्तर पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है. कई देशों में सूखा पड़ने से फसल उत्पादन घटेगा और सप्लाई चेन प्रभावित होगी. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने की संभावना है. कुल मिलाकर, यह जलवायु घटना खेतों से लेकर शहरों की बिजली व्यवस्था और आम जीवन तक गहरा असर डाल सकती है.